बक्सर की सियासत में ‘बल’ की बिसात !जनसेवा हुई किनारे, सत्तालालच बना सहारे!नौकरशाह उतरे मैदान में, सत्ता की चमक के दीवाने! खाकी से खादी तक — रंग बदल रही राजनीति! जनता पूछे सवाल “सेवा का वादा या सत्ता का सौदा?”
बक्सर - बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण नजदीक है, लेकिन जिले की सियासत का रंग इस बार कुछ अलग है. चारों विधानसभा क्षेत्रों बक्सर, डुमराँव, राजपुर और ब्रह्मपुर, से जो तस्वीरें निकल कर आ रही हैं, वह तस्वीरे जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है. की लोकतंत्र के इस महापर्व में धनबल, बाहुबल और सत्ताबल का खेल पहले से ज्यादा खुलकर सामने आ रहा है. क्या राजनीति अब जनसेवा का मंच नहीं, बल्कि सत्ता पाने और अपनी आर्थिक हैसियत बढ़ाने का ज़रिया बन गई है?
नौकरशाह बने नेता, लेकिन ‘सेवक’ की भावना कहाँ?
पूर्व एसपी आनंद मिश्रा उम्मीदवार एनडीए
जिले में इस बार पूर्व नौकरशाह से लेकर देश की हिफाजत करने वाले पूर्व सेना के जवान खुद को “जनसेवक” बताकर अब विधायक और मंत्री बनने की राह पर हैं।ल. लेकिन जनता का एक वर्ग सवाल उठा रहा है. जब नौकरी में रहते हुए जनता की सेवा का अवसर था, तब कितने गरीबों का इलाज करवाया? कितने बच्चों को स्कूल तक पहुंचाया? और कितनों के जीवन में सच में उजाला लाए?
क्या कहते है स्थानीय लोग ?
खेतो में काम करते किसान ! को नही करनी है राजनीति !
स्थानीय निवासी और किसान लालबिहारी गोंड़ व्यंग्य करते हुए कहते हैं — “जब अफसर लोग ही विधायक-सांसद बनने लगें, तो सरकार को ‘राजनीति विद्यालय’ खोल देना चाहिए. ताकि बच्चे डॉक्टर-इंजीनियर नहीं, नेता बनने की पढ़ाई करें.” वे आगे कहते हैं — “जब खाकी का रंग खादी से मिलने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि खेल सिर्फ सेवा का नहीं, सत्ता का है.”
डुमराँव की सियासत ‘लाइट, कैमरा, एक्शन!’
डुमराँव विधानसभा क्षेत्र में तो मानो चुनाव प्रचार नहीं, फिल्मी सेट चल रहा है. नेता हेलीकॉप्टर से उतर रहे हैं, कैमरों की फ्लैश लाइटें चमक रही हैं, सोशल मीडिया पर पोस्टरबाजी हो रही है, बेरोज़गार नौजवान फिर भी उम्मीद लगाए बैठे हैं. की हेलीकॉप्टर से उतरने वाले नेता जी के पास, किसानों, बेरोजगार जवानों, के लिए कोई भविष्य की योजना भी है. या केवल नक्सलिज्म, आतंकवाद, और खून की छीटे पर ही चुनाव लड़ने आ गए है.स्थानीय लोगों का कहना है कि जो चेहरे कभी गांव की गलियों में दिखाई नहीं दिए, वे अब वोट मांगने पहुंचे हैं. जनता पूछ रही है — “हमारे खेतों में जब पानी सूख गया था, तब ये कहाँ थे? हमारी आवाज़ जब दबाई गई, तब किसने साथ दिया?”
‘जनसेवा’ बनाम ‘सत्तासेवा’ का संघर्ष!
बक्सर की राजनीति का बदलता चेहरा बताता है कि अब हेलीकॉप्टर से लैंडिंग करने वाले उम्मीदवार के पास सोशल मीडिया टीम है, प्रचार के लिए करोड़ों का बजट है, लेकिन जनता के मुद्दों पर बोलने का वक्त उनके पास नहीं है. युवाओं की बेरोजगारी, किसानों की कर्ज़माफी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सवाल अब भाषणों के नीचे दबकर रह गए हैं. जनता के बीच यह चर्चा आम है कि अब चुनाव जीतना जनसेवा का प्रमाण नहीं, बल्कि ‘पैसे और पावर’ के गठजोड़ का नतीजा है. सत्ताबल के सहारे कुर्सी तक पहुंचने वाले नेताओं को जनता का दर्द न दिखता है, न सुनाई देता है।).
जनता करेगी फैसला ! जुमलों से नही जमीन पर होगा चुनाव !
लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास होती है, लेकिन जब वोट खरीदने की संस्कृति गहराने लगे, तो व्यवस्था की आत्मा घायल हो जाती है. बक्सर की गलियों में आज यही सवाल गूंज रहा है — “क्या हम ऐसे नेताओं को चुनेंगे जो पैसे से वोट लेते हैं, या ऐसे प्रतिनिधि को जो सच्चे दिल से सेवा का वादा करता है?”अब वक्त है कि जनता खुद तय करे की क्या राजनीति सेवा का औज़ार बनेगी या जनता की आवाज़ को दबाने का हथियार?क्योंकि अगर जनता जागरूक न हुई, तो लोकतंत्र सिर्फ एक ‘चुनावी तमाशा’ बनकर रह जाएगा. और सरकार के नुमाइंदे यह कहते देर नही करंगे की बक्सर को धाम बनाने की घोषणा तो केवल जुमला था. जिनके पार्टी के लोग केंद्र से लेकर प्रदेश में मंत्री रहते इस बक्सर को पर्यटन का दर्जा तक नही दिला सके अब उनके नेता इसे लंदन बनाने का सब्जबाग दिखा रहे है.




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