बीच सड़क पर ही दिखा जदयू के सीनियर नेताओ की रियल्टी शो ! राहुल की टीम में कौन है भाकपा विधायक अजीत कुशवाहा का एजेंट ! डुमराँव जदयू में बगावत की शुरू हुई जंग!

जदयू प्रत्याशी राहुल सिंह की "सत्ताई रियालिटी शो‘  चुनावी कार्यालय के सामने ही आपस में भिंडे जदयू के कई सीनियर नेता. देश सेवा को छोड़कर जनता सेवा करने चले नेता जी एजेंट के सहारे जितना चाहते है चुनाव ! खाकी छोड़कर खादी पहनने वाले अब "देश भक्ति" से ज़्यादा "डील" में व्यस्त!

बक्सर-बिहार  विधानसभा चुनाव 2025 के आहट के साथ ही डुमराँव की सियासत का रंग हर घंटे बदल रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंच से उतरते ही मंच के नीचे नेताओं की राजनीति ने बवाल मचा दिया। जैसे ही सीएम की हेलीकॉप्टर जमीन से ऊपर उठा ! वैसे ही जदयू की सियासी नाव में ऐसे छेद पड़े कि डुमराँव की राजनीति का तालाब खुद ‘भंवर’ बन गया। राज हाई स्कूल मैदान में सीएम नीतीश कुमार ने जब जनता से कहा— “एनडीए की सरकार विकास के रास्ते पर है”, तो शायद यह नहीं सोचा था कि उनके जाते ही उसी मंच के साए में ‘विकास’ की जगह ‘विवाद’ की जंग छिड़ जाएगी . एक तरफ जंहा जदयू प्रत्याशी राहुल सिंह की ‘डिजिटल सेना’ भिंड में  पोस्टर और कैमरे के ज़रिए नेता जी की ब्रांडिंग करने में लगी थी. तो दूसरी तरफ जदयू के सीनियर नेता बीच सड़क पर ही आपस में ऐसा भिंड गए कि , नेता जी का पूरा पोल पट्टी ही खोलकर रख दी. और पार्टी के अंदरूनी कलह सड़क पर आ गई. जिसके बाद स्थानीय दुकानदारों से लेकर राहगीरो ने जमकर ठहाके लगये! की नेता जी जनता के सहारे नही एजेंट के सहारे चुनावी मैदान में है.

डुमराँव में दिखा सियासत का रियल्टी शो !

सीनियर नेताओ ने खोली राज

 जब जदयू प्रत्याशी राहुल सिंह के चुनावी कार्यालय के सामने बीच सड़क पर सीनियर नेता आपस में भिड़े, तो मीडिया का माइक ऑन था, कैमरा रिकॉर्ड कर रहा था, और जनता तमाशा देख रही थी— मानो चुनावी मैदान नहीं, नेता जी का रियलिटी शो चल रहा हो। वीडियो में आरोपों की बौछार ऐसी थी कि “विकास” शब्द को खोजने में अब एडिटिंग सॉफ्टवेयर  भी नाकाम हो जाता। नेता जी के  समर्थक दूसरे नेता पर बरसे— “आप तो अजीत कुशवाहा के एजेंट हैं!”उधर राहगीरों ने हँसते हुए कहा— “लगता है राहुल सिंह की नैया, अजित कुशवाहा की भंवर में फँस गई है, और नाविकों ने ही डुबाने का ठेका ले लिया है।”

नेता जी की नजर हुई कमजोर ! 

 विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश मे में नेताओ की नजरें वँहा पहुँचती भी नही है जंहा जमीनी वोटर है. जनता बेरोज़गारी और महँगाई की भँवर में फँसी है, वहीं नेता जी चुनाव को “पैसे और पब्लिसिटी की परेड” बना चुके हैं। राहुल सिंह की टीम में सोशल मीडिया के योद्धा ऐसे जोश से लगे हैं मानो "लाइक" ही वोट हों और "कमेंट" से सरकार बन जाती हो। वास्तविकता यह है कि जमीनी वोटर वहाँ हैं जहाँ नेता की नज़र ही नहीं पहुँचती — गाँव की धूल, किसानों के खेत, और युवाओं के सवालों में।

स्थानीय जनता का व्यंग्य !

"डिजिटल सेना वाले सेल्फी लेते हैं, और असली कार्यकर्ता जनता के बीच सेल्फ-रेस्पेक्ट खो देते हैं!"लोग कहते हैं, आज के नेता कैमरे के सामने ‘जनसेवक’ और कैमरा ऑफ होते ही ‘पूंजीपति ठेकेदार’ बन जाते हैं। राहुल सिंह हों या उनके प्रतिद्वंदी, हर कोई आज "पैसे और प्रचार" की राजनीति का मॉडल पेश कर रहा है, जहाँ जनता केवल "एक्स्ट्रा" की भूमिका में है। पार्टी के भीतर की गुटबाज़ी यह साबित कर चुकी है कि डुमराँव में लड़ाई विपक्ष से कम, अपने ही घर के चिरागों से ज़्यादा है। जो नेता कभी संगठन के लिए ढाल बनते थे, अब व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के लिए जंजीर बन गए हैं। और सबसे दिलचस्प बात यह कि—जो कल तक सरकार की नीतियों का लाभ उठा रहे थे, आज ‘जनसेवा’ के नाम पर सत्ता की नई निविदा निकाल रहे हैं।

राजनीति विचार की नही बोल रही है कमीशन की भाषा !

राजनीति अब विचार की नहीं, ‘कमीशन’ की भाषा बोल रही है। जिसके पास पैसा है, वही प्रचार में ‘भक्त’ है और जिसके पास जनता है, वही असली ‘संकट’। डुमराँव की धरती, जो कभी बशिष्ठ नारायण सिंह जैसे सिद्धांतनिष्ठ नेताओं की कर्मभूमि रही, आज ‘डील और डीजे’ की सियासत में फँस चुकी है।नेता बदलते हैं, लेकिन जनता का दर्द वही रहता है वोट के वक्त मुस्कान, चुनाव के बाद पहचान नहीं।”और शायद यही वजह है कि आज डुमराँव का मतदाता कह रहा है हमें नेता नहीं, एक ईमानदार नाविक चाहिए, जो भंवर से नैया निकाल सके।”

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