जनसुराज के चुनावी चक्रव्यूह में फंसे बड़े-बड़े राजनीतिक योद्धा ! बड़े दल के नेताओ का हिला आत्मविश्वास ! डिजिटल से सोशल मीडिया में लगाते रह गई जयकारे, स्थानीय लोगो ने कहा नेता जी नही जीतेंगे चुनाव डिजिटल मीडिया के सहारे !

 बक्सर सदर विधानसभा सीट पर चुनावी तापमान चरम पर, हर घंटे बदल रहा है समीकरण! जनसुराज के तथागत हर्षवर्धन बने राजनीति के नए ‘गेम चेंजर’!भीतरघात और अंतर्कलह से परेशान कार्यकर्ता छोड़ रहे पुराने ठिकाने! ग्रामीण बोले “डिजिटल जयकारे वाले नेता हारे, ज़मीन से जुड़ा आदमी ही जीतेगा”! जनसुराज ने तोड़ा बड़े- बड़े दलों का आत्म विश्वास !

बक्सर- 200 सदर विधानसभा की राजनीति इस बार बिल्कुल अलग मिजाज में दिख रही है। चुनावी घड़ी नज़दीक आते ही यहां  हर घण्टे नया समीकरण बन रहा है। एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ही खेमों में अंदरखाने की खींचतान और भीतरघात से कार्यकर्ता असमंजस में हैं। परंपरागत निष्ठा अब ढीली पड़ती दिख रही है। इसी राजनीतिक ऊहापोह के बीच जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार तथा सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता तथागत हर्षवर्धन ने इस चुनावी जंग को नया मोड़ दे दिया है। जनसुराज की चुनावी चक्रव्यूह में सभी सियासी दल के नेता ऐसे उलझ गए है. की वह केवल एक दूसरे का वीडियो वायरल कर जनता के बीच अपनी सियासी सोच को दर्शा दिए है.  उनके पास खुद की कोई राजधर्म वाली  राजनीति की नीति नही है. स्थानीय लोगो की माने तो बड़े दलों के नेताओ को हर हाल में केवल कुर्सी चाहिए , इसके लिए सेंट्रल से लेकर अन्य प्रदेशों के नेताओ की फौज उतार दी है. जिससे कि सत्ता में अपना मनमानी किया जा सके ! लेकिन जनता इसबार पूरी तरह से सजग है! कोई बाहरी  लुटेरा अब अपने सियासी चाल की जाल में नही फांस पायेगा!

ग्रामीण इलाकों में बड़े दलों के नेताओ के साथ क्यो हो रहा है दुर्व्यवहार ?

एक तरफ जंहा ग्रामीण इलाकों में  पहले बड़े- बड़े दलों के नेताओ का बोलबाला था, वहां की जनता अब उनके साथ दुर्व्यवहार कर रही है. उनके पोस्टर फाड़े जा रहे है. उनको खदेड़ा जा रहा है. वही दूसरी तरफ जनसुराज के जमीनी अभियान ने सबका ध्यान खींच लिया है। गांवों में लोगों की जुबान पर एक ही नाम है — “तथागत हर्षवर्धन, जो डिजिटल नहीं, जमीन पर हैं।” उनकी सादगी और सीधी भाषा मतदाताओं के दिलों में जगह बना रही है। ग्रामीणों की माने तो सोशल मीडिया पर जो बड़े दलों के नेताओ का हर दिन राजनीतिक चरित्र दिखाई दे रहा है. उससे उनकी नीति और नियत दोनों साफ हो गई है. क्या आईपीएस की नौकरी छोडकर इसी तरह की राजनीति करने के लिए आये थे? और जो लोग 10 बर्षो तक विधायक रहे  उनको यह सोचने की जरूरत नही है कि आखिर जनता का भरोसा पर खरा क्यो नही उतर पाया ?

क्या कहते है जनसुराज के उम्मीदवार?

तथागत खुद कहते हैं। “मैं जमीनी आदमी हूं, इसलिए जमीन पर रहने वालों की तकलीफ समझता हूं। मुझे डिजिटल जयकारे से नहीं, जनता के सहारे सदन तक जाना है।” उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ने बिहार को सिर्फ वादों में उलझा दिया। “चुनाव के वक्त जो नेता हाथ जोड़ते हैं, वही बाद में जनता के सिर पर चढ़ जाते हैं,”

 क्या कहते है राजनीति के जानकार ? 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बक्सर की यह जंग परंपरागत दलों बनाम जनसुराज के नए प्रयोग की लड़ाई बन चुकी है। जहां एनडीए और इंडिया गठबन्धन के नेता अपने पुराने वोट बैंक पर निर्भर है, वहीं जनसुराज ने गांव-गांव संवाद यात्रा और जनसंपर्क से माहौल बना दिया है। कई पंचायतों में स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ-साथ युवाओं की नई टोली जनसुराज के लिए कैंपेन चला रही है।

दिलचस्प यह है कि सोशल मीडिया पर जहां बड़े दलों की डिजिटल सेनाएं शोर मचा रही हैं, वहीं मैदान में जनसुराज के कार्यकर्ता दरवाजे-दरवाजे जनसंवाद कर रहे हैं। ग्रामीणों की मानें तो “ऊपर वाले जयकारा लगा रहे हैं, नीचे वाले जनसुराज के साथ खिसक गए हैं।”

सादगी भरी राजनीति के कायल हुए लोग !

तथागत हर्षवर्धन की लोकप्रियता का एक कारण उनकी सादगी भी मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के तेजतर्रार वकील और पूर्व मंत्री के बेटे होने के बावजूद, उन्होंने अपने आपको हमेशा आम लोगों के बीच बनाए रखा। कोर्ट की गूंज और गांव की गलियों के बीच तालमेल ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि जनसुराज का यह मॉडल बिहार की राजनीति में नया प्रयोग साबित हो सकता है। यह आंदोलन सत्ता पाने से ज़्यादा व्यवस्था बदलने के एजेंडे के साथ उतर रहा है। यदि बक्सर में जनसुराज का प्रदर्शन मजबूत रहा, तो इसका असर आसपास की सीटों पर भी पड़ेगा।

अब देखना यह है कि क्या तथागत हर्षवर्धन का यह “जमीनी अभियान” वाकई बड़े दलों की नींद हराम करता रहेगा या फिर परंपरागत ताकतें अपने पुराने समीकरणों से बाज़ी पलट देंगी। लेकिन इतना तय है की बक्सर की हवा इस बार पुरानी दिशा में नहीं बह रही।

Post a Comment

0 Comments