वादों की चकाचौंध में गुम होती ज़िंदगी: बक्सर की पीड़ा, किसानों की त्रासदी और सिस्टम की बेरुख़ी से अनजान है रील वाले नेता जी !
बक्सर—सियासत के चमकते मंच पर नेता जी ने बड़े—बड़े वादों के संग चुनाव जीतकर परचम तो लहरा दिया, लेकिन ज़मीन पर उतरते ही हक़ीक़त की तस्वीर बिल्कुल उलट दिखती है। रियल समस्याओं को दूर करने का नारा देकर सत्ता की कुर्सी तक पहुँचे नेता जी आजकल रील बनाने और बनवाने में इतने व्यस्त हैं कि जनता की वास्तविक पीड़ा को सुनने का वक़्त उनके पास नहीं बचा। सोशल मीडिया को शिकायत केंद्र बनाकर उन्होंने मान लिया कि दुनिया बदल जाएगी, लेकिन बक्सर के लोगों की ज़िंदगी वहीं की वहीं खड़ी है—जाम में फँसी, धूल में लिपटी और उम्मीदों में टूटी।
जाम की समस्या—जो यूपी पर थोप दी गई !
बक्सर पटना फोरलेन की खूसूरत तस्वीर !
बक्सर की सड़कों पर रोज़ाना घंटों जाम में फँस कर सड़कें, कामकाज और ज़िंदगी सब थम जाते हैं। शहर से लेकर गाँव तक लोगों की यातायात व्यवस्था बदहाल है। लेकिन जवाब देने की जगह अधिकारी और नेता जी इसे “उत्तरप्रदेश की वजह” बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यह दलील अब बक्सर वासियों को छलावे जैसी लगने लगी है। क्योंकि समस्या वहीं है, जनता वहीं है, पर ज़िम्मेदारी कहीं और डालकर नेता जी ने खुद को बचा लिया—या यूँ कहें कि बचाने की कोशिश की है।
किसान—वोट बैंक नहीं, ज़िंदगी है
खेतो में सड़ते किसानों के अरमान
चुनाव के दौरान आए मोंथा चक्रवात ने किसानों की पूरी मेहनत को उजाड़ कर रख दिया। खेतों में सोने की तरह लहलहाती धान की फसल देखते-देखते सड़ने लगी। किसानों ने उम्मीद की थी कि नई सरकार आएगी तो राहत, मुआवज़ा और सहायता के नाम पर कोई ठोस कदम उठाएगी। लेकिन अधिकारियों ने “ऑल इज़ वेल” की रिपोर्ट भेज दी—कागज़ में सब कुछ ठीक, जबकि हक़ीक़त में खेतों में पड़े धान से दुर्गंध उठ रही है और किसानों की आँखों में आँसू। यह बेरुख़ी नहीं, प्रणालीगत क्रूरता है—जहाँ किसान सिर्फ चुनावी सभाओं के भाषणों में याद आते हैं। और ताउम्र सरकारी बाबुओ के मेहरबानी के मोहताज रहते है!
स्वास्थ्य व्यवस्था—उम्मीदों का नहीं, अव्यवस्थाओं का घर !
कहीं नए सर्जिकल उपकरण धूल खा रहे हैं, कहीं अस्पताल में बेड की कमी है, और कहीं मरीजों को जमीन पर लिटाकर इलाज किया जा रहा है। यह तस्वीर किसी पिछड़ी बस्ती की नहीं, बल्कि उस बक्सर की है जिसे नेता जी “तेज़ी से विकसित होता जिला” बताते नहीं थकते। कागज़ों में स्वास्थ्य केंद्र अप-टू-डेट हैं, सोशल मीडिया पोस्ट में विकास की गंगा बह रही है, लेकिन अस्पतालों में मरीजों की कराहट यह साबित कर रही है कि विकास सिर्फ तस्वीरों में है, हक़ीक़त में नहीं।
नेताओं को जनता की ज़रूरत से ज्यादा, कैमरे की फ़िक्र
नेता जी को अब जनता नहीं, फ़ॉलोअर्स चाहिए। समस्याओं का समाधान नहीं, रील्स का व्यू चाहिए। कभी सड़क पर खड़े होकर ट्रैफिक के बीच वीडियो शूट, कभी अस्पताल का निरीक्षण सिर्फ कैमरे के सामने, कभी मीटिंग सिर्फ सोशल मीडिया पर अपलोड करने के लिए—क्या यही जनता की सेवा है? विकास का मॉडल अब “विज़ुअल परफॉर्मेंस” बन गया है, न कि वास्तविक काम।
सोई संवेदनाओं को जगाने का समय !
बक्सर वासियों का अब सवाल पूछने का वक़्त आ गया है। किसानों को अब अपनी पीड़ा को आवाज़ देने का वक़्त है।युवाओं को अब रील नहीं, वास्तविक बदलाव की मांग करने का वक़्त है। क्योंकि जब जनता सो जाती है, तब नेता अपनी मनमानी करते हैं। जब जनभावना दब जाती है, तब सिस्टम बेलगाम हो जाता है। और जब सवाल बंद हो जाते हैं, तो विकास भी रुक जाता है।यह बक्सर की कराह है, किसानों की पुकार है और उन आम लोगों की आवाज़ है जो रोज़ संघर्ष कर रहे हैं।



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