अमित शाह के आगमन से पहले ही बक्सर की सियासत में आया “शाहकाल”! जनता बोली—विकास नहीं, “डील” के किस्से ज़्यादा चर्चित हैं! राक्षसों का अंत या विरोधियों का वध,रामायण से तुलना पर छिड़ी बहस! टिकट से निकले तूफ़ान ने पार्टी संगठन की जड़ों तक हिला दीं! डिजिटल सेना बनाम नाराज़ कार्यकर्ता—बक्सर बना भाजपा की अग्निपरीक्षा
बक्सर- 24 अक्टूबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का बक्सर दौरा होना है, लेकिन इससे पहले ही जिले की सियासत में तूफ़ान उठ चुका है. कभी भाजपा का गढ़ माने जाने वाला बक्सर, अब पार्टी के अंदरूनी भूचाल और जनता की बेरुखी का प्रतीक बनता दिख रहा है. महागठबंधन की एकजुटता और स्थानीय नेताओं की जुमलेबाजी से ऊब चुकी जनता ने पिछले दो चुनावों में भाजपा को सत्ता से दूर रखा है. यही कारण है कि अब खुद अमित शाह को मैदान में उतरना पड़ रहा है.
देश के सबसे बड़े प्रदेश को प्रभावित करता है बक्सर का चुनावी परिणाम !
बक्सर, जो उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा हुआ है, बिहार और यूपी दोनों की राजनीतिक नब्ज़ को प्रभावित करता है. यहाँ के नतीजे कई बार पूर्वांचल की सीटों पर असर डाल चुके हैं. शायद यही वजह है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक सबकी निगाहें अब बक्सर पर टिक गई हैं. लेकिन भाजपा की मुश्किल सिर्फ विपक्ष से नहीं है. पार्टी के अंदर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा. स्थानीय कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि संगठन युवा चेहरों को मौका देगा, परंतु टिकट एक पूर्व नौकरशाह को सौंप दिया गया. नतीजा यह हुआ कि कार्यकर्ता भड़क उठे. नाराज़ कार्यकर्ताओं ने विरोधस्वरूप आनंद मिश्रा के खिलाफ ही पर्चा दाखिल कर दिया. हालात बेकाबू होते देख पार्टी को हस्तक्षेप करना पड़ा, और अमित शाह ने स्वयं हस्तक्षेप कर नामांकन वापस कराया !
राजनीतिक गलियारों में सवाल !
अब राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है.आख़िर इस समझौते के पीछे “डील” क्या हुई? क्या यह सिर्फ पार्टी अनुशासन का मामला था या कुछ और बड़ी सियासी मजबूरी? इस बीच, अमित शाह के बक्सर आने का घोषणा के साथ ही सोशल मीडिया पर “डिजिटल जंग” शुरू हो चुकी है. आनंद मिश्रा की डिजिटल सेना सक्रिय हो गई है. असम से लेकर मुंबई और दिल्ली तक से पोस्टें आ रही हैं, जिनमें मिश्रा की तुलना “सिंघम” और “सुपर कॉप” से की जा रही है. वहीं, भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं ने अमित शाह की तुलना भगवान राम से कर डाली—लिखा गया कि “त्रेतायुग में राक्षसों का अंत करने के लिए श्रीराम बक्सर आए थे, अब राजनीति के राक्षसों का अंत करने भाजपा के चाणक्य अमित शाह आ रहे हैं.”
भाजपा के इस पोस्ट से मची बवाल !
बीजेपी के इस पोस्ट से सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक बवाल हो गया है. इसके साथ ही एक नई बहस भी छिड़ गई है- क्या लोकतंत्र की जननी बिहार में राजनीतिक विरोधियों को “राक्षस” कहना जायज़ है? विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक मर्यादा पर हमला बताया है.
युवाओं का सवाल से परेशान डिजिटल सेना !
दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर युवा वर्ग भाजपा से सवाल कर रहा है—“15 लाख रुपये का क्या हुआ?” और “अच्छे दिन कब आएंगे?” इस डिजिटल हमले ने भाजपा की प्रचार टीम की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बक्सर इस बार भाजपा के लिए “फील्ड टेस्ट” बन चुका है. पार्टी के अंदरुनी असंतोष और जनता की बेरुखी अगर ठीक से नहीं संभाली गई, तो अमित शाह का यह दौरा “मिशन रेस्क्यू बक्सर” साबित हो सकता है.
कई खेमे में बंटी है लोगो की राय !
वहीं स्थानीय मतदाताओं की राय भी दो ध्रुवों में बंटी दिख रही है—कुछ का मानना है कि अमित शाह का आगमन संगठन में नई जान फूंकेगा, जबकि बाकी कहते हैं कि “राम के नाम पर राजनीति” अब जनता को समझ आ गई है. कुल मिलाकर, बक्सर का राजनीतिक माहौल इस समय गर्म है—डिजिटल युद्ध, नाराज़ कार्यकर्ता, और “राम बनाम राक्षस” की सियासी पटकथा—सब कुछ एक साथ चल रहा है. अब देखना दिलचस्प होगा कि अमित शाह का यह दौरा भाजपा के लिए “चाणक्य नीति” साबित होता है या “बक्सर की लंका-दहन”!



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