झोपड़ी पर गरजा बुल्डोज़र, महलों पर प्रशासन की मौन प्रार्थना! बक्सर में विकास का नया मॉडल — अमीरों को सलाम, गरीबों को अलविदा!

 झोपड़ी पर गरजा बुल्डोज़र, महलों पर प्रशासन की मौन प्रार्थना! बक्सर में विकास का नया मॉडल — अमीरों को सलाम, गरीबों को अलविदा! तड़का नाला से गंगा किनारे तक… सरकारी ज़मीन पर बस झोपड़ी ही अवैध? रील वाले नेता चुप — शायद स्क्रिप्ट अभी तैयार नहीं! जहाँ कभी पशु मेला था, वहाँ अब ‘भू-माफ़िया मेवा’ है! प्रशासन का बुल्डोज़र  केवल गरीबों के लिए आरक्षित?

बक्सर -  हाल के दिनों में प्रशासन का बुल्डोज़र ऐसे गरजता दिखाई दे रहा है जैसे इसका इंजन सिर्फ घास–फूस वाले घरों को ही पहचानता हो। एनडीए की नई सरकार के कड़े एक्शन का असर शायद सिर्फ गरीबों की बस्तियों तक ही सीमित है। नगर थाना क्षेत्र के सिंडिकेट नहर किनारे बने झोपड़ीनुमा आशियानों को जिस तेजी से ध्वस्त किया गया, उसे देखकर यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या पूरे जिले में अवैध निर्माण सिर्फ इन्हीं गरीबों ने किया था?

कहा गया पशुमेला की 52 विगहा जमीन !

दो दशक पहले जिस सिंडिकेट गोलम्बर के 52 विगहा सरकारी भूमि पर एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला लगता था, आज वहीं बड़े-बड़े भू-माफियाओं के आलीशान मकान, मल्टीस्टोरी और व्यापारिक प्रतिष्ठान उग आए हैं।  जहाँ कभी पशुओं की आवाज़ें गूँजती थीं, अब वहाँ महंगी कारों की चाभियाँ झनझनाती हैं। जिस ज़मीन पर अरबों की अनधिकृत इमारतें खड़ी हो चुकी हैं, उस पर बुल्डोज़र का GPS शायद सिग्नल ही नहीं पकड़ता है!

 तड़का नाला, सरकारी तलाब और विश्राम सरोवर — नक्शे में सरकारी, ज़मीन पर निजी!

नगर परिषद के सामने, पीछे, चारों तरफ तड़का नाला, सरकारी तालाब, विश्राम सरोवर जैसी संपत्तियों पर सफेदपोशों ने बखूबी कब्जे कर इमारतें खड़ी कर लीं। यह कब्जे इतने खुलेआम हुए कि प्रशासन चाहे तो ऑफिस की खिड़की से ही इन्हें देख सकता है। पर क्यों देखे? क्योंकि देखने का मतलब कार्रवाई करना, और कार्रवाई का मतलब कई बड़े नामों की नींद खराब करना।और नींद तो लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील चीज है ! नेता से लेकर अफसर तक, सबके लिए!

 बड़ी बाजार की अरबों की जमीन  कब्जा चुप है साहब !

बड़ी बाजार की वह जमीन जहाँ कभी बिहार ही नहीं, यूपी से भी व्यापारी आते थे, आज पूरी तरह कब्जाई जा चुकी है। यहाँ बड़े-बड़े प्रतिष्ठान खड़े हो गए, दुकानें चमकने लगीं, मुनाफा बढ़ने लगा। पर अफसोस! प्रशासन को यह सब कभी अवैध दिखा ही नहीं ! शायद व्यापारी के बोर्ड पर लगी LED लाइटें घर की फूस वाली झोपड़ी की तरह नहीं झिलमिलातीं, इसलिए ध्यान वहाँ नहीं गया।

गरीबों का दर्द — घर ढहा, सपने टूटा, आवाज़ दब गई !

 जब बुल्डोज़र आया तो किसी ने यह नहीं पूछा कि उनका कसूर क्या था? जिस रात छत ढही, उस रात कई परिवारों ने आँसूओं को तकिये में दबाकर सोने की कोशिश की। प्रशासन के आदेश की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि बच्चों का रोना भी खो गया। सहमी हुई आवाज यह बताने के लिए काफी था! कि गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नही !

 रील वाले नेता जी  चुनावी भाषणों से “म्यूट मोड” तक

अभी हाल ही के विधानसभा चुनावों में जिन नेताओं के रील वीडियो बक्सर से दिल्ली तक वायरल थे आज वही नेता इस पूरे घटनाक्रम पर चुप हैं। शायद रील शूट हो रही है, या शायद यह मुद्दा उनके कैमरे के फ्रेम में फिट नहीं बैठता। लोकतंत्र के मंच पर उनकी चुप्पी बताती है ! स्क्रिप्ट चाहे जनता लिखे, डायलॉग वही बोलते हैं जो सत्ता चाहती है।

. बड़ा सवाल  क्या अवैध सिर्फ गरीब?

क्या सचमुच पूरे बक्सर में सिर्फ गरीबों की झोपड़ियाँ ही अवैध हैं?क्या प्रशासन की डायरी में अमीरों के महल पवित्र और गरीबों के आशियाने पाप की श्रेणी में आते हैं? यदि हाँ, तो यह सिर्फ बुल्डोज़र एक्शन नहीं, बल्कि न्याय पर सवाल है।

गौरतलब है कि बक्सर में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है, यह इबारत कितनी खूबसूरत है, यह  वही बता सकता है जिसका घर अब मलबा बन चुका है। यदि सरकार गरीब को हटाकर अमीर की तिजोरी मजबूत करने का ही संकेत दे रही है, तो यह विकास नहीं यह विस्थापन का नया मॉडल है।

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