जिले में अतिक्रमण पर प्रशासन का दोहरा चरित्र! गरीबों की झोपड़ियों पर बुल्डोजर, रसूखदारों के महलों पर ‘मोहब्बत’ बरकरार !
बक्सर – जिले में इन दिनों बुल्डोजर की गड़गड़ाहट तेज है, लेकिन यह आवाज सिर्फ वहाँ सुनाई दे रही है जहाँ गरीबों की झोपड़ियाँ, फूस के घर और बांस-बल्ली के सहारे खड़ी पवित्र ‘महलनुमा’ रचनाएँ मौजूद हैं। जिला प्रशासन इन झोपड़ियों को तोड़कर अपनी पीठ थपथपाने में इतना मशगूल है कि सरकारी जमीन पर खड़ी ईंट, सीमेंट और संगमरमर वाली गगनचुंबी इमारतें शायद उन्हें दिखाई ही नहीं देतीं। मानो उन आलीशान इमारतों के पास पहुंचते ही प्रशासन की दृष्टि शक्ति अचानक छुट्टी पर चली जाती हो।
स्थानीय लोगो ने कसा तंज !
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन का यह ‘कलर ब्लाइंडनेस’ सिर्फ रसूखदारों की संपत्ति के सामने ही सक्रिय हो जाता है। बाकी समय अधिकारी दूर से ही किसी झोपड़ी को देखकर ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का ऐसा अलार्म बजाते हैं कि पूरा तंत्र सक्रिय हो उठता है। लोग चुटकी लेते हुए कहते हैं कि बड़े साहब, सफेदपोश और अरबपति लोगों ने जो सरकारी जमीनों पर महल खड़े किए हैं, उन पर कार्यवाही करने की हिम्मत कोई क्यों नहीं करता? क्योंकि उनकी एक छींक से ही पूरा सिस्टम ठंडी में कंपकपाने लगता है। इसलिए कानून का राज बनाए रखने के लिए गरीबों की झोपड़ी तोड़ना सबसे जरूरी है—क्योंकि असली अतिक्रमणकारी वही हैं जिन्होंने बड़े लोगों की हवेलियों के सामने 8×10 की झोपड़ी खड़ी कर ‘गुनाह’ कर दिया है।
नगर परिषद कार्यालय के सामने ही अतिक्रमण का ‘अदृश्य चमत्कार’
सत्यदेवगंज रोड की बात ही निराली है। नगर परिषद कार्यालय के सामने ही रोज सड़क पर सब्जी, मांस और मछली की दुकानें खुलकर सजती हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यह अतिक्रमण अधिकारियों को दिखाई नहीं देता! वजह बेहद वैज्ञानिक है—जहाँ से रोज किसी के घर में मुफ्त की सब्ज़ी पकती हो और किसी की जेब गर्म होती हो, वहाँ अतिक्रमण अपने आप ‘इनविजिबल मोड’ में चला जाता है। लोग कहते हैं कि अधिकारी रोज उसी रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन वहाँ उन्हें सड़क पूरी तरह खाली, व्यवस्थित और स्वच्छ दिखाई देती है। बस जनता को ही यह सड़क हर वक्त जाम और भीड़ से भरी नजर आती है। शायद जनता की आँखें ज्यादा तेज हैं या प्रशासन के चश्मे में कोई खास फिल्टर लगा है—यह शोध का विषय है।
गरीबों पर सख्ती, बड़े लोगों पर नरमी – चर्चा गलियों से चौक तक
शहर के चौक-चौराहों से लेकर गांव की गलियों तक चर्चा यही है कि गरीबों की झोपड़ी से प्रशासनिक सख्ती की शुरुआत कर व्यवस्था का ‘शानदार’ उदाहरण पेश किया जा रहा है। उधर, सरकारी जमीन पर खड़ी करोड़ों की हवेलियाँ गरीबी और मासूमियत के प्रतीक बनकर खड़ी हैं, जिन पर हाथ डालना प्रशासन के बस की बात नहीं।स्थानीय लोगों ने तंज कसते हुए कहा—“अरे भई, बड़े-बड़े लोगों की इमारतें तो सरकारी जमीन पर बनी एक तरह की ‘सांस्कृतिक धरोहर’ हैं। उन पर बुल्डोजर चलाना प्रशासन की ‘संवेदनशीलता’ के खिलाफ है। इसलिए बेहतर है कि गरीबों की झोपड़ियाँ ही उड़ाई जाएँ, ताकि कानून का अस्तित्व सिद्ध हो सके।”
बुल्डोजर का ‘चयनित न्याय’ जारी !
जिले में अतिक्रमण हटाओ अभियान फिलहाल बिल्कुल सफल है—बशर्ते आप गरीब हों। अगर आप रसूखदार हैं, तो आपके घर की दीवारें ही नहीं, आपकी मुरादें भी सरकारी जमीन पर फलती-फूलती रहेंगी। प्रशासन का दोहरा चरित्र जिले की जनता के बीच चर्चा और व्यंग का विषय बना हुआ है, लेकिन कार्रवाई में कोई बदलाव नहीं। बक्सर में फिलहाल एक ही नियम चल रहा है—“गरीबों का अतिक्रमण अतिक्रमण है, और अमीरों का अतिक्रमण… विकास!”


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