बक्सर में सत्ताधारी दल के नेता पर स्थानीय लोगो ने लगाया गम्भीर आरोप ! जासो रोड में पांच विघा सरकारी तलाब की जमीन बेचने का लगा गम्भीर आरोप ! स्थानीय लोगो ने कसा तंज कहा । बिक गया सरकारी तालाब ! गहरी निंद्रा में गोते लगाते रहे जिला प्रशासन एवं नगरपरिषद के अधिकारी और कर्मी ! म्यूटेशन का मायाजाल: जहां पैसा, वहीं कानून , गरीब की झोपड़ी पर बुल्डोजर, भू-माफिया के महल पर पर्दा । जासो रोड से राज खुले: अंचल कार्यालय या दलालों का अड्डा? सरकारी जमीन बनी रसूखदारों की जागीर !
गोलम्बर जासो रोड
बक्सर – यह बिहार का बक्सर जिला है साहब! यहां सरकारी जमीन कोई अभेद्य धरोहर नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के लिए सपना और भू-माफियाओं के लिए सुनहरा अवसर है। ताजा मामला बक्सर गोलंबर–जासो रोड का है, जहां सत्ताधारी दल से जुड़े एक नेता ने कथित तौर पर सरकारी तालाब की करीब पांच बीघा जमीन को अरबों रुपये में बेच दिया। स्थानीय लोगो के इस आरोप के बाद महकमें में हड़कम्प मच गई है! हैरत की बात यह नहीं कि जमीन बेची गई, बल्कि यह कि अंचल कार्यालय के कर्मियों ने बाकायदा म्यूटेशन कर रसीद भी काट दी—मानो सरकारी तालाब नही निजी खेत हो! स्थानीय लोगों का कहना है कि जासो रोड स्थित इस तालाब की जमीन वर्षों से सरकारी अभिलेखों में दर्ज है। लेकिन कागजों की दुनिया में चमत्कार होते देर नहीं लगती। जहां रसूख हो, वहां तालाब भी प्लॉट बन जाता है और सरकारी जमीन निजी संपत्ति में तब्दील हो जाती है। नगर परिषद से लेकर जिला प्रशासन तक कुछ अधिकारी “जी हुजूरी” में इतने मशगूल रहे कि अवैध सौदे दिन के उजाले में पूरे हो गए। जब मामला स्थानीय लोगों ने उठाया, तब जाकर नगर परिषद हरकत में आई और आनन-फानन में डीड खंगालकर कोर्ट जाने की तैयारी हो रही है!
नगरपरिषद कार्यालय बक्सर !
सवाल यह है कि क्या अंचल कार्यालय भू-माफियाओं के चंगुल में है? जिला प्रशासन के नाक के नीचे अरबो की सरकारी जमीन पर कब्जा हो गई ! और किसी को भनक तक नही लगी है! जानकरों का कहना है कि, जिस 5 बीघे जमीन की चर्चा हो रही है! वह आज भी नक्से में सरकारी तलाब है! फिर उसका म्यूटेशन कर जमीन का निजी रशीद कैसे काट दी गई !
पूरा शहर में भू -माफियाओ का दबदबा बरकरार !
जिला मुख्यालय के नगर परिषद क्षेत्र में ज्योति चौक से रामरेखाघाट तक सड़क के दोनों ओर—ताड़का नाला, बसाव बड़ी मठिया की जमीन, विश्राम सरोवर, गोलंबर का पशु मेला और अब जासो रोड का सरकारी तालाब—जिस पर गगनचुंबी इमारतें खड़ी हैं। इन सभी सरकारी भूमि पर अंचल कार्यालय ने निजी जमीन का मुहर लगा दी ! जिसकी रसीदें चमक रही हैं। यह चमत्कार नहीं तो और क्या है?
साहब की यह कैसी गठजोड़ !
नाम न छापने की शर्त पर नगर परिषद के एक कर्मचारी बताते हैं—“बड़े साहबों के दफ्तरों में भू-माफिया जनकल्याण की बात करने नहीं जाते, सौदे तय होते हैं। गरीब आदमी को अपनी ही जमीन का म्यूटेशन कराने में पसीना छूट जाता है।” एक ही प्लॉट पर दो भाइयों की कहानी सिस्टम की सच्चाई बयान करती है—जिसने पैसा दिया, उसका म्यूटेशन हो गया; जिसने नहीं दिया, उसके कागजों में खामियां निकल आईं। नतीजा—एक कट्ठा जमीन में आधा सही, आधा गलत! और अब वह गरीब वर्षों से डीसीएलआर कार्यालय के चक्कर काट रहा है।
झोपड़ी पर अधिकारी करते है लाइट, एक्शन, कैमरे वाली कार्रवाई!
फुटपाथ पर जीवन यापन करने वालों की झोपड़ियों पर बुल्डोजर बड़ी तत्परता से चलता है, कैमरे बुलाए जाते हैं, कार्रवाई की तस्वीरें साझा होती हैं। लेकिन जब बात गगनचुंबी अवैध इमारतों की आती है, तो अधिकारियों की आंखों में अचानक “मोतियाबिंद” हो जाता है। न नोटिस दिखता है, न नापी याद आती है, न ही रिकॉर्ड। जासो रोड का मामला सिर्फ एक जमीन की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की आत्मा पर सवाल है। क्या सरकारी तालाब बिकेंगे और गरीब सूखे रहेंगे? क्या कानून सिर्फ कमजोर के लिए है? यदि अंचल कार्यालय में बैठे लोग ही म्यूटेशन का मायाजाल बुनेंगे, तो फिर न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
अब निगाहें प्रशासन और न्यायालय पर हैं। सवाल यह भी—क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों की धूल में दब जाएगा? बक्सर के लोग जवाब चाहते हैं, क्योंकि यहां अब यह कहावत चल पड़ी है—जहां रसूख, वहां रसीद; जहां गरीब, वहां परेशानी!



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