बक्सर में बुलडोजर का चयनित न्याय: झोपड़ी पर कहर, गगनचुंबी इमारतों पर मेहरबानी ! अरबों की सरकारी जमीन पर ‘मौन स्वीकृति’: भू-माफियाओं का मसीहा कौन?

 बक्सर में बुलडोजर का चयनित न्याय: झोपड़ी पर कहर, गगनचुंबी इमारतों पर मेहरबानी ! अरबों की सरकारी जमीन पर ‘मौन स्वीकृति’: भू-माफियाओं का मसीहा कौन? रामरेखा घाट से स्टेशन रोड तक बना लूट का राजपथ, अफसरों की आँखों पर बंधी पट्टी! त्रेतायुग का सरोवर बना नाली: उड़ाही–जीर्णोद्धार के नाम पर लाखों की लीला राम के नाम की सियासत और राम की विरासत पर कब्जा!

बक्सर—जिला मुख्यालय इन दिनों एक अनोखे प्रशासनिक प्रयोग का गवाह बना हुआ है। नगर परिषद क्षेत्र में जहां कहीं भी सड़क किनारे झुग्गी-झोपड़ी दिखाई देती है, वहां बुलडोजर की दहाड़ सुनाई देने लगती है। ऐसे में आम लोग यह सवाल पूछने को मजबूर हैं कि क्या रामरेखा घाट से लेकर स्टेशन रोड तक अरबों रुपये की सरकारी जमीन पर खड़ी गगनचुंबी इमारतें अफसरों को “आधुनिक विकास” का नमूना लगती हैं?सवाल यह नहीं है कि ये इमारतें कैसे खड़ी हुईं, असली सवाल यह है कि इनके पीछे किसका आशीर्वाद है? और सबसे बड़ा सवाल—इन पर कार्रवाई कब होगी?

सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का स्थायी डेरा

रामरेखा घाट से स्टेशन रोड तक सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं ने मानो स्थायी कब्जा जमा लिया है। नहर, आहर, तालाब, पोखरा और सरोवर अब केवल सरकारी नक्शों में बचे हैं। हकीकत यह है कि गौशाला, पशुमेला, चर्च और कब्रिस्तान तक की जमीन पर कंक्रीट का साम्राज्य खड़ा हो चुका है।  अरबों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति निजी इमारतों में तब्दील हो गई, लेकिन जिला प्रशासन से लेकर नगर परिषद तक के अधिकारियों ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है। शायद यह चुप्पी भी किसी फाइल में ‘मौन स्वीकृति’ कहलाती हो।

राम के नाम पर सियासत, विरासत पर कब्जा !

राम के नाम पर सियासत करने वाले राजनेताओं के शासन में राम से जुड़ा त्रेतायुग का विश्राम सरोवर आज गंदी नाली में तब्दील हो चुका है। बक्सर की इस ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत पर भी भू-माफियाओं ने कब्जा जमा लिया है। बीते तीन वर्षों में उड़ाही और जीर्णोद्धार के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए—या यूं कहें कि सरकारी राशि ‘डकार’ ली गई। न सरोवर साफ हुआ, न उसकी गरिमा लौटी। कागजों में विकास और जमीन पर बदहाली—यही है आज का सुशासन मॉडल।

बक्सर में दिशाहीन हो गया बुलडोजर ?

नगर परिषद क्षेत्र में जब भी बुलडोजर चलता है, उसकी दिशा लगभग तय होती है—गरीब की ओर। फुटपाथ पर जीवन यापन करने वालों को पहले हटाया जाता है और फिर उसी फुटपाथ पर खड़े होकर अधिकारी गर्व से कहते हैं“अतिक्रमण हटाया गया।” लेकिन उन्हीं की आंखों के सामने सरकारी नहर पर बनी बहुमंजिला इमारतें दिखाई नहीं देतीं। शायद ऊंचाई के कारण नजर ऊपर नहीं जाती, या फिर झोपड़ी ही सबसे आसान निशाना होती है।

अफसरशाही की रहस्यमयी मेहरबानी !

नगर परिषद और जिला प्रशासन के कर्मचारियों की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। कहीं फाइलें आगे नहीं बढ़तीं, कहीं नोटिस समय पर नहीं निकलते और कहीं निरीक्षण का रास्ता ही भटक जाता है। स्थानीय लोग पूछते हैं—“संरक्षण किसका है?”और जवाब में अफसर मौन साध लेते हैं। यह मौन किसी योग-साधना से कम नहीं, जिसमें जवाबदेही पूरी तरह विलुप्त हो जाती है।

भू-माफियाओं का मसीहा कौन?

देश और प्रदेश में जैसे ही चुनाव आते हैं, मंचों से राम-राज्य की बातें होने लगती हैं। लेकिन जमीन पर राम की विरासत सिमटती जा रही है। त्रेतायुग का सरोवर नाली बन चुका है, घाटों पर भू-माफिया काबिज हैं और विकास के नाम पर कंक्रीट की पूजा जारी है। सवाल साफ है—क्या बुलडोजर का इंजन सिर्फ गरीब की झोपड़ी पहचानता है? क्या गगनचुंबी इमारतें कानून से ऊंची हैं?आज बक्सर का बच्चा-बच्चा पूछ रहा है—भू-माफियाओं का मसीहा कौन है? किसके संरक्षण में यह सब संभव हो रहा है? अगर इन सवालों का जवाब नहीं मिला, तो बुलडोजर की यह चयनित दहाड़ लोकतंत्र के कानों में लंबे समय तक गूंजती रहेगी।

सुशासन तब होगा, जब बुलडोजर की नोक बराबरी देखे—झोपड़ी भी और गगनचुंबी इमारत भी। वरना यह ‘बक्सर मॉडल’ इतिहास में एक व्यंग्य बनकर दर्ज होगा—जहां कानून नीचे झुका और कंक्रीट ऊपर चढ़ गया।

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