बिजली के उजाले में बक्सर की सांसें काली! NGT नियम काग़ज़ों में, ज़मीन पर कोयले की बारिश! हरे-भरे खेत काले, किसान लाठी से खामोश! विकास किसका? बीमार गांव, चमकते दफ्तर! चौसा में पावर, जनता बेबस—आत्मनिर्भरता की यह कैसी कीमत?
बक्सर- बिहार को बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का सपना जिस चौसा थर्मल पावर प्लांट से जोड़ा गया था, वही आज बक्सर जिले के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। 1320 मेगावाट क्षमता वाले एसजेवीएन पावर प्लांट की एक यूनिट शुरू होते ही विकास के दावों के पीछे छिपा कड़वा सच सामने आने लगा है। घनी आबादी के बीच बने कोयला यार्ड से लोडिंग–अनलोडिंग के दौरान उड़ता काला डस्ट अब हवा में नहीं, सीधे आम लोगों की सांसों में भर चुका है। यह डस्ट सिर्फ आंखों में जलन नहीं पैदा कर रहा, बल्कि पूरे इलाके की ज़िंदगी को धीरे-धीरे ज़हर में बदल रहा है।
फाइलों में कैद कानून! ज़मीन पर बेखौफ प्रदूषण
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के नियम कोयले की हैंडलिंग, ढुलाई और भंडारण को लेकर सख्त दिशा-निर्देश देते हैं, लेकिन चौसा में ये नियम सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा बनकर रह गए हैं। हकीकत यह है कि घनी आबादी के बीच खुलेआम कोयला उतारा जा रहा है, डंपरों में भरा जा रहा है और उड़ती धूल गांवों तक मौत का संदेश पहुंचा रही है। कभी हरियाली से लहलहाने वाले खेत, पेड़-पौधे और फसलें आज काले रंग में रंग चुकी हैं। किसानों की महीनों की मेहनत पर जैसे कोयले की मोटी परत जम गई हो—जो न बारिश से उतरती है, न सिस्टम की आंखें खोल पाती है।
संवाद नहीं, लाठी है जवाब !
सबसे शर्मनाक तस्वीर तब सामने आती है, जब इस ज़हर के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्नदाता किसानों को “विकास विरोधी” बताकर चुप कराने की कोशिश होती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां आंदोलन का जवाब संवाद से नहीं, बल्कि लाठी से दिया जाता है। प्रशासन, जिसका काम जनता की सुरक्षा करना है, वही हर बार कंपनी की ढाल बनकर खड़ा नजर आता है। सवाल सीधा है क्या विकास का मतलब यही है कि किसान चुप रहे और ज़हर पीता रहे?
कागजो में ही सिमटकर रह गया हरे पेड़ों को लगाने का वादा !
काली सच्चाई यही है कि कंपनी ने प्रदूषण कम करने के नाम पर करीब पांच लाख पेड़ लगाने का वादा किया था। लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी न हरियाली दिखती है, न नीयत। इसके उलट, गांवों में दमा, खांसी, आंखों में जलन, त्वचा रोग आम होते जा रहे हैं। छोटे बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं—अगर आसपास के गांव ही बीमार हो जाएंगे, तो यह बिजली किसके काम आएगी?
कुछ के लिए वरदान तो कुछ के लिए जहर !
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह पावर प्लांट कुछ तथाकथित राजनेताओं और चंद अधिकारियों के लिए “दुधारू पशु” बन चुका है। सगुन–सौगात के दम पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं सीएसआर फंड से गांव के स्कूल, अस्पताल या पर्यावरण को कुछ मिले या न मिले, लेकिन कुछ दफ्तरों की रंगाई-पुताई जरूर हो जाती है—और बाहर बोर्ड लगाकर उसे समाज सेवा का तमगा दे दिया जाता है।
काले घर, काली हवा, काला भविष्य!
ख़िलाफ़तपुर, अखौरीपुर गोला समेत आधा दर्जन गांवों के लोग आज अपने ही घरों में कैद हैं। आंगन, दीवारें, कपड़े, पेड़,सब कुछ काले कोयले से सना है। साफ हवा अब यादों में सिमटती जा रही है। यह सिर्फ प्रदूषण की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जहां इंसान से ज्यादा मशीन की कीमत है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बिहार की आत्मनिर्भरता की कीमत किसानों की सेहत से चुकाई जाएगी? क्या विकास का मतलब यह है कि कुछ लोग चमकते दफ्तरों में बैठें और गांव काली सांसें लें?
गौरतलब है कि अब भी सिस्टम की सोई हुई आत्मा नहीं जागी, तो यह काला धुआं सिर्फ आसमान नहीं ढंकेगा—यह आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी अंधेरे में डुबो देगा।



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