शराबबन्दी के बाद ‘सूखा नशा’ बना नया ज़हर !बक्सर बना ड्रग्स की चुपचाप राजधानी! 12 साल के बच्चे से 50 साल के बुज़ुर्ग तक गिरफ्त में

शराबबन्दी के बाद ‘सूखा नशा’ बना नया ज़हर !बक्सर बना ड्रग्स की चुपचाप राजधानी! 12 साल के बच्चे से 50 साल के बुज़ुर्ग तक गिरफ्त में खेत, स्कूल, कब्रिस्तान—कोई जगह सुरक्षित नहीं ! अब चेतना या तबाही: समाज के सामने आख़िरी सवाल !

बक्सर- बिहार में शराबबन्दी कानून लागू होने के बाद उम्मीद थी कि नशे से समाज को राहत मिलेगी, परिवार बिखरने से बचेंगे और युवा ऊर्जा रचनात्मक दिशा में जाएगी। लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रही है। शराब की अनुपलब्धता ने एक नए और कहीं अधिक खतरनाक नशे को जन्म दे दिया— ‘सूखा नशा’, जिसमें सुलेशन, हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स शामिल हैं। इसका सबसे भयावह उदाहरण बनकर उभर रहा है बक्सर जिला, जहाँ नशा अब चोरी-छिपे नहीं, बल्कि खुलेआम समाज की आँखों में आँख डालकर फैल रहा है।

शहर से लेकर गाँव तक सूखे नशे की चपेट में युवा पीढ़ी !

स्थिति इतनी गंभीर है कि बक्सर के शहरी इलाकों से लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक 12 साल के बच्चे से लेकर 50 साल के जिम्मेदार उम्र के लोग इस ज़हर की चपेट में आ चुके हैं। ज्योति चौक, जिला अतिथिगृह के पीछे, अंग्रेज कब्रिस्तान, पुराना सदर अस्पताल, ठोरा पुल, इटाढ़ी रेलवे गुमटी के पूरब, पीसी कॉलेज कैम्पस, ग्यारह नम्बर लख नया बाजार—ये सिर्फ़ इलाके नहीं, बल्कि सूखे नशे के हॉटस्पॉट बन चुके हैं। हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि गांवों में चारदीवारी रहित सरकारी स्कूलों, खेतों में लगी फसलों के बीच, और सुनसान सार्वजनिक स्थलों पर युवा पीढ़ी नशे का सेवन करती देखी जा रही है।

सामाजिक चेतना के पतन की कहानी !

यह सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के पतन की कहानी है। नशे की यह लत युवाओं के शरीर को ही नहीं, उनके भविष्य, परिवार और समाज की नींव को खोखला कर रही है। पढ़ाई छूट रही है, अपराध बढ़ रहा है, मानसिक रोग पनप रहे हैं और परिवार अंदर ही अंदर टूट रहे हैं। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि कई माता-पिता इस सच को स्वीकार करने से भी डरते हैं, और तब तक चुप रहते हैं जब तक बहुत देर नहीं हो जाती।

अंधेरे के बीच एक उम्मीद की किरण !

इसी अंधेरे के बीच एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है बक्सर का पहला नशा मुक्ति केंद्र। बक्सर गोलंबर पर फल मंडी के समीप शुरू हुआ ‘जन समाज कल्याण नशा मुक्ति केंद्र’ उन युवाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है, जो इस नरक से बाहर निकलना चाहते हैं। केंद्र के संचालक गौतम कुमार बताते हैं कि नशा अब सिर्फ़ व्यक्ति की समस्या नहीं रहा, यह पूरे समाज को बर्बादी की ओर धकेल रहा है। उनका कहना है कि केंद्र में मरीजों को रखकर, पूरी निगरानी में, दवा, नियमित व्यायाम, संतुलित खान-पान और साइकैट्रिक डॉक्टरों की देखरेख में इलाज किया जाएगा। ! गौतम कुमार के अनुसार, प्रति माह लगभग 10 हजार रुपये के खर्च में 3 से 5 महीने के भीतर व्यक्ति को पूरी तरह नशामुक्त किया जा सकता है। बिहटा में संचालित इसी तरह के केंद्र में 20 से 82 वर्ष तक के लोगों का सफल इलाज इस बात का प्रमाण है कि अगर समय रहते सही कदम उठाया जाए, तो वापसी संभव है।

बर्बादी की राह पर बक्सर की युवा पीढ़ी !

इस नशा मुक्ति केंद्र में पहुँचे भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता सह समाज सेवी दीपक पांडेय ने बताया कि, नगर थाना क्षेत्र के शांतिनगर से लेकर गाँव-गाँव तक सूखे नशे का कारोबार खूब फल फूल रहा है! जिसके जद में आये  नौजवान लड़के समाज के मुख्यधारा से भटक गए है! और उनकी एक अलग ही दुनिया है! समय रहते यदि समाज एवं प्रशासन ने सकरात्मक कदम नही उठाया तो इसका खामियाजा पूरे परिवार के साथ समाज को भी चुकाना होगा! इस समस्या का समाधान एक केंद्र से हल होने वाला नहीं है। यह समय है सामूहिक आत्ममंथन का। प्रशासन, पुलिस, शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक संगठन और सबसे बढ़कर परिवार—सबको अपनी भूमिका निभानी होगी। अगर आज भी हमने आंखें मूंदे रखीं, तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ़ नहीं करेगी।

यह खबर सिर्फ़ सूचना नहीं, चेतावनी है। आज अगर हमने अपने बच्चों का हाथ थाम लिया, तो कल उन्हें ताबूत उठाने से बचा सकते हैं। चुनाव अब हमारे हाथ में है— जागरूक समाज या नशे में डूबा भविष्य।

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