बक्सर में तथाकथित ‘धरती के भगवान’ का कारोबार!अवैध निजी नर्सिंग होम, कमीशन और मौतों की चुप्पी एक हफ्ते में तीन मौतें, जिम्मेदार कौन? सवाल पूछो तो धमकी, सिस्टम मौन कार्रवाई का दावा, जमीनी हकीकत शून्य !
बक्सर -बिहार के बक्सर जिले में अवैध निजी नर्सिंग होम का कारोबार न सिर्फ फल-फूल रहा है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम लोगों की जान से खिलवाड़ का जरिया बन चुका है। डुमरांव और बक्सर अनुमंडल के शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में 500 मीटर से लेकर एक किलोमीटर के दायरे में छोटे-बड़े अस्पतालों की भरमार है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक कर्मी के अनुसार जिले में करीब 500 से अधिक वैध और अवैध निजी अस्पताल संचालित हैं। इनमें से कई बिना पुख्ता संसाधन, मानक और योग्य डॉक्टरों के इलाज कर रहे हैं।
एक सप्ताह में तीन मौत !
पिछले एक सप्ताह में अलग-अलग निजी नर्सिंग होम में तीन मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। दो महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हुई। आरोप है कि आशा कर्मियों ने परिजनों की असहमति के बावजूद कमीशन के लालच में निजी अस्पतालों में भर्ती कराया। नतीजा—दो जिंदगियां चली गईं। स्वास्थ्य विभाग की माने तो एक मामले में नया बाजार, बक्सर के अस्पताल ने परिजनों से समझौता कर लिया, जबकि दूसरे में डुमरांव के अस्पताल और संबंधित आशा कर्मी के खिलाफ एफआईआर के लिए आवेदन दिया गया है।
रेफर या जबरन निकासी?
ठीक अगले दिन गोलंबर क्षेत्र में 53 वर्षीय व्यक्ति की इलाज के दौरान मौत हो गई। निजी नर्सिंग होम का दावा है कि मरीज को सही हालत में रेफर किया गया, जबकि परिजनों का आरोप है कि हालत बिगड़ने पर जबरन एम्बुलेंस से बाहर भेजा गया। सदर अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने मरीज को ब्रॉट डेड घोषित कर दिया। इसके बाद परिजनों का आक्रोश फूट पड़ा और मामला सुर्खियों में आया।
सवाल पूछने पर पत्रकारों पर रौब !
जब कुछ पत्रकारों ने आरोपों के आधार पर खबरें प्रकाशित कीं, तो जवाबदेही तय होने के बजाय उल्टा पत्रकारों को ही घेरने की कोशिश हुई। बैठक बुलाकर यह संदेश दिया गया कि चिकित्सा जगत से जुड़ी कोई भी खबर लिखने से पहले “परमिशन” ली जाए। कुछ ने समर्थन किया, कुछ ने विरोध—लेकिन सवाल कायम है कि क्या सच लिखना अब अनुमति का मोहताज है?
कौन है फर्जी, कौन है डिग्रीधारी?
इसी बैठक में यह भी दावा किया गया कि 80 प्रतिशत इलाज अवैध लोग कर रहे हैं, जिन्हें डॉक्टर कहकर खबर न लिखी जाए। अगर यह सच है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है—इन अवैध नर्सिंग होम को संरक्षण कौन दे रहा है? खबर छपते ही कुछ दिन की छापेमारी, फिर लंबी चुप्पी ! यह पैटर्न बताता है कि कार्रवाई से ज्यादा मैनेजमेंट पर भरोसा है।
कार्रवाई क्यों नहीं? बहाना या लाभ?
जब भी अवैध निजी नर्सिंग होम पर कार्रवाई को लेकर सिविल सर्जन से सवाल होता है, जवाब मिलता है—“सरकार ने पावर छीन ली है, हम डमी हैं। 40 बेड तक अस्पताल चलाने के लिए लाइसेंस जरूरी नहीं।” तो सवाल उठता है कि एसडीएम ने किस नियम के तहत डॉक्टर ज्ञान प्रकाश के अस्पताल को सील किया? क्या बक्सर में कानून अलग-अलग है?
दशक पुरानी शिकायतें, नई मौतें
बक्सर में ! यह पहला मामला नहीं है। बीते एक दशक में पैसे के अभाव में लाश बंधक बनाने जैसे आरोप सामने आते रहे हैं। आज भी तस्वीर वही है—लापरवाही, दबाव, समझौता और चुप्पी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब सवाल पूछने वालों को डराने की कोशिश भी खुलकर होने लगी है।
गौरतलब है कि अगर दोषी नहीं हैं, तो अस्पताल छोड़कर भागने की जरूरत क्यों पड़ती है? धरती के तथाकथित भगवानो को बक्सर में अवैध निजी नर्सिंग होम का यह खेल सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, प्रशासनिक विफलता भी है। लापरवाही होगी तो कलम चलेगी—क्योंकि पत्रकार पोस्टर बॉय नहीं, जनता की आवाज है।

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