नहर पर रोड, फाइलों में हरियाली! बक्सर में आरओबी के नाम पर सिंडिकेट नहर दफन ! गरीबों के घर टूटे, ठेकेदारों को खुली छूट! ‘मृत नहर’ का नया जुमला, सवालों में प्रशासन जल जीवन हरियाली या विकास की बलि?
बक्सर- जिले के नगर थाना क्षेत्र में जयप्रकाश नारायण बस अड्डा के पूरब स्थित सिंडिकेट नहर को मिट्टी से भरकर आरओबी (रेल ओवर ब्रिज) के लिए संपर्क पथ बनाया जा रहा है। यह काम ठेकेदार द्वारा खुलेआम किया जा रहा है, लेकिन जिस तरह एक जल स्रोत को समतल कर सड़क में बदला जा रहा है, उसने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी जल जीवन हरियाली योजना की जमीनी हकीकत को कठघरे में खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों का सीधा सवाल है—अगर नहर को मिट्टी में दबाना ही विकास है, तो फिर जल संरक्षण आखिर किसे कहते हैं? सरकार की जिस योजना का उद्देश्य जल स्रोतों को बचाना, अतिक्रमण से मुक्त कराना और भविष्य के लिए संरक्षित करना था, उसी योजना की धज्जियां बक्सर में उड़ती नजर आ रही हैं।
कभी जल स्त्रोत तो कभी मृत नहर का जुमला !
हैरानी की बात यह है कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस मामले में अलग-अलग दलीलें दे रहे हैं। कोई इसे “विकास कार्य” बता रहा है, तो कोई यह कहकर पल्ला झाड़ रहा है कि सिंडिकेट नहर एक “मृत नहर” है। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर नहर मृत थी, तो तीन साल पहले इसी नहर को जीवित जल स्रोत बताकर पत्थर कुटवा मोहल्ले के सैकड़ों गरीब परिवारों को क्यों उजाड़ा गया? कड़ाके की ठंड में प्रशासन ने जल संरक्षण का हवाला देकर उनके घर तोड़ दिए थे—वह दर्द आज भी लोगों के दिलों में ताजा है।
स्थानीय लोगो का आरोप !
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नियम गरीबों के लिए सख्त और ठेकेदारों व प्रभावशाली लोगों के लिए लचीले हैं। जब बस्ती उजाड़ी गई, तब नहर जीवित थी और जब सड़क बनानी है, तब वही नहर मृत कैसे हो गई? यह दोहरा मापदंड प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सिंडिकेट क्षेत्र के स्थानीय लोगो ने तंज कसते हुए कहा कि, जल जीवन हरियाली योजना अब पोस्टर और भाषणों तक सिमट कर रह गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जल स्रोत पर निर्माण अवैध है, तो लॉ कॉलेज के समीप सिंडिकेट नहर पर परिवहन कार्यालय की विशाल इमारत आखिर कैसे खड़ी हो गई? क्या उस वक्त नियमों की किताब बंद कर दी गई थी?
पर्यावरण विशेषज्ञों ने जताई चिंता !
वही इस मामले को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि शहरी इलाकों में नहरों और जल निकासी तंत्र को खत्म करना भविष्य में जलजमाव, बाढ़ और पर्यावरणीय संकट को न्योता देना है। बक्सर पहले से ही जल निकासी की समस्या से जूझता रहा है, ऐसे में नहर को भरना आने वाले वर्षों में शहर के लिए भारी पड़ सकता है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी से उठ रहे है सवाल !
शहर के बीचोबीच से गुजरने वाली इस नहर को भरकर एप्रोच रोड़ प्रकरण पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रहे है! चुनाव के वक्त जल, हरियाली और पर्यावरण पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जब वही जल स्रोत मिट्टी में दबाए जाते हैं, तब नेता केवल जुमलेबाजी तक सीमित रह जाते हैं।
गौरतलब है कि यह मामला सिर्फ एक नहर या एक सड़क का नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों, प्रशासनिक जवाबदेही और विकास की परिभाषा पर बड़ा सवाल है। अगर बक्सर में जल जीवन हरियाली योजना को इसी तरह “मृत” घोषित किया जाता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों के हिस्से न जल बचेगा, न हरियाली—सिर्फ नारे, फाइलें और टूटे हुए भरोसे रह जाएंगे।

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