मझरिया की राख में भी ज़िंदा है इंसानियत अग्निकांड पीड़ितों के आंसुओं पर विश्वामित्र सेना का मरहम कंबलों के साथ पहुँचा भरोसा, टूटा नहीं हौसला राजकुमार चौबे का संकल्प—पीड़ितों के साथ आख़िरी दम तक
बक्सर- मझरिया गांव में हुए भीषण अग्निकांड ने कई परिवारों के घर ही नहीं, बल्कि उनके सपनों, स्मृतियों और सुरक्षित भविष्य की उम्मीदों को भी राख में बदल दिया है। अचानक आई इस त्रासदी में लगभग एक दर्जन झोपड़ियाँ जलकर खाक हो गईं। 60-70 क्विंटल अनाज, नगदी, जरूरी कागजात और पशुधन आग की भेंट चढ़ गए। दर्जनों परिवार खुले आसमान के नीचे जीवन जीने को मजबूर हो गए।
संकट की घड़ी में बनी सहारा—विश्वामित्र सेना
जब पीड़ित परिवार ठंड, भय और अनिश्चितता से जूझ रहे थे, उसी समय विश्वामित्र सेना उनके लिए संबल बनकर सामने आई। अग्निकांड की सूचना मिलते ही संगठन ने मानवीय संवेदना के साथ राहत कार्य प्रारंभ किया। संगठन के प्रतिनिधि गोवर्धन चौबे के नेतृत्व में संगठन के सदस्यों ने मझरिया पहुँचकर अग्नि पीड़ित परिवारों के बीच कंबलों का वितरण किया । ये कंबल केवल ठंड से बचाव का साधन नहीं थे, बल्कि यह संदेश भी थे कि पीड़ित इस संघर्ष में अकेले नहीं हैं।
पीड़ितों की आंखों में दर्द, मदद से जगी उम्मीद
कंबल वितरण के दौरान महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की आंखों में पीड़ा साफ झलक रही थी। पीड़ितों ने बताया कि आग ने उनके घर, अनाज, कपड़े और वर्षों की मेहनत पल भर में छीन ली। ऐसे में विश्वामित्र सेना की यह पहल उनके लिए केवल राहत नहीं, बल्कि भावनात्मक संबल बन गई। कई परिवारों ने कहा कि जब भविष्य अंधकारमय लग रहा था, तब यह मदद उम्मीद की किरण बनकर आई।
“यह सिर्फ राहत नहीं, हमारा दायित्व है” — राजकुमार चौबे
विश्वामित्र सेना के राष्ट्रीय संयोजक राजकुमार चौबे ने फोन पर बातचीत में कहा—“मझरिया के अग्नि पीड़ित परिवारों का दर्द हमारा अपना दर्द है। विश्वामित्र सेना केवल कंबल बांटकर नहीं रुकेगी, बल्कि हर संभव मदद के लिए आगे भी सक्रिय रहेगी।” उन्होंने बताया कि संगठन पीड़ितों की आवश्यकताओं का आकलन कर आगे खाद्यान्न, वस्त्र और पुनर्वास से जुड़ी सहायता भी उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा। साथ ही प्रशासन और समाज के अन्य वर्गों से भी आगे आने की अपील की जाएगी, ताकि पीड़ित परिवार सम्मानपूर्वक जीवन की नई शुरुआत कर सकें।
सियासत नहीं, सेवा की मिसाल
स्थानीय लोगों ने विश्वामित्र सेना की इस पहल की खुलकर सराहना की। लोगों का कहना है कि आज के समय में जब अधिकांश लोग केवल बयानबाजी तक सीमित रहते हैं, ऐसे में ज़मीनी स्तर पर की गई यह मदद समाज को सकारात्मक संदेश देती है। यह साबित करती है कि संवेदना और सेवा आज भी जीवित हैं।
एक पत्रकार ने दिखाई दरियादिली
इस अग्निकांड के दौरान मझरिया गांव निवासी पत्रकार बबलू उपाध्याय की मानवीय भूमिका की भी चारों ओर सराहना हो रही है। उन्होंने न केवल आग बुझाने में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि गंभीर रूप से झुलसे शिवजी यादव को तत्काल विश्वामित्र हॉस्पिटल में भर्ती कराने में अहम योगदान दिया। इसके साथ ही वे पीड़ित परिवारों तक सहायता पहुँचाने के लिए सामाजिक स्तर पर लगातार प्रयासरत हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि संकट की इस घड़ी में पत्रकार बबलू उपाध्याय ने पत्रकारिता के साथ-साथ इंसानियत का भी परिचय दिया।
अग्निकांड में भारी नुकसान
मझरिया गांव के इस अग्निकांड में—
लगभग एक दर्जन झोपड़ियाँ जलकर राख हो गईं
60–70 क्विंटल अनाज नष्ट हो गया
करीब 68 हजार रुपये नकद जल गए
दो बछड़ों और एक गाय की दर्दनाक मौत हो गई
पशुओं को बचाने के दौरान गृहस्वामी शिवजी यादव करीब 80 प्रतिशत तक झुलस गए, जिनका इलाज विश्वामित्र हॉस्पिटल में चल रहा है। विश्वामित्र हॉस्पिटल के डॉक्टर राजीव झा के अनुसार—“मरीज 80 प्रतिशत तक जला हुआ है। उसकी स्थिति गंभीर बनी हुई है और निरंतर इलाज किया जा रहा है।”बेजुबानों की जान बचाने के लिए जिस इंसान ने अपनी जान को खतरे में डाल दिया हो वह कोई साधारण इंसान नही हो सकता! और हम उसके इस दिलेरी , अदम्य साहस को सैल्यूट करते है!
इंसानियत की लौ अब भी जल रही है
मझरिया का यह अग्निकांड भले ही भौतिक रूप से सब कुछ जला गया हो, लेकिन विश्वामित्र सेना और समाज के संवेदनशील लोगों की पहल ने यह साबित कर दिया कि इंसानियत की लौ को बुझाया नहीं जा सकता। दर्द से टूटे दिलों पर जब सहानुभूति का हाथ रखा जाता है, तो जख्म भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। मझरिया के पीड़ितों के लिए यह राहत सिर्फ मदद नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की उम्मीद है।

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