पाँच हजार के कमीशन में बिक रही ज़िंदगियाँ, कई निजी नर्सिंग होम बने मौत के अड्डे डिलीवरी के नाम पर दलाली, मौत के बाद समझौते की गारंटी! आशा या एजेंट? गरीब महिलाओं को निजी अस्पताल तक ढोने का खेल लाइसेंस कहीं और, अस्पताल कहीं और

पाँच हजार के कमीशन में बिक रही ज़िंदगियाँ, कई  निजी नर्सिंग होम बने मौत के अड्डे डिलीवरी के नाम पर दलाली, मौत के बाद समझौते की गारंटी! आशा या एजेंट? गरीब महिलाओं को निजी अस्पताल तक ढोने का खेल लाइसेंस कहीं और, अस्पताल कहीं और… कार्रवाई कहीं नहीं! बक्सर में स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में, अफसर सिर्फ बयान में ज़िंदा!

बक्सर- जिले के बक्सर और डुमरांव अनुमंडल में एक सप्ताह के भीतर निजी नर्सिंग होम में डिलीवरी के दौरान दो महिलाओं की मौत ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल की बजाय निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराने के बदले पाँच हजार रुपये तक का कमीशन लिया जा रहा है। इस खेल में गरीब महिलाओं की जान सबसे सस्ती साबित हो रही है। दोनों मामलों में महिला की मौत के बाद परिजनों का सब्र टूट गया। निजी नर्सिंग होम में जमकर हंगामा हुआ। पीड़ित परिवारों ने डुमरांव थाना में लिखित शिकायत और एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन कार्रवाई के बजाय बक्सर में “समझौते” और “बार्गेनिंग” का खेल चलने का आरोप लगाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या पैसे देकर मौत का सौदा किया जा सकता है?

आशा कर्मियों पर गम्भीर आरोप !

मृत महिलाओं के परिजनों का आरोप है कि आशा कर्मियों ने बार-बार दबाव बनाकर निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया। बेहतर इलाज का भरोसा दिलाया गया और डिलीवरी के नाम पर पहले 30 हजार रुपये जमा कराए गए। लेकिन जब महिला की हालत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई, तो कथित तौर पर डॉक्टर और स्टाफ अस्पताल छोड़कर फरार हो गए। चौंकाने वाली बात यह है कि एक मामले में निजी नर्सिंग होम द्वारा परिजनों से समझौता कर लेने का दावा खुद स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने किया। इससे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या समझौते से अपराध खत्म हो जाता है? क्या मौत के बाद भी अस्पताल को खुला छोड़ दिया जाएगा?

आशा कर्मियों के भरोसे चल रहे निजी नर्सिंग होम?

सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिले के कई निजी नर्सिंग होम आशा कर्मियों के भरोसे चल रहे हैं। सरकार ने आशा कर्मियों की नियुक्ति ग्रामीण महिलाओं को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने के लिए की थी, लेकिन अब वही निजी अस्पतालों के लिए मरीज जुटाने का माध्यम बनती दिख रही हैं। एक आशा कर्मी का बयान कैमरे में सामने आया है, जिसमें उसने निजी नर्सिंग होम तक मरीज पहुंचाने के बदले मिलने वाले कमीशन का खुलासा किया है। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

एफआईआर के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?

सिविल सर्जन का कहना है कि किसी आशा कर्मी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं मिली है, जबकि परिजनों ने थाना में एफआईआर दर्ज कराई है। सवाल उठता है कि क्या थाना में दर्ज शिकायत अधिकारियों तक नहीं पहुंचती, या फिर जानबूझकर आंख मूंद ली जाती है?

लाइसेंस कहीं और, अस्पताल कहीं और

मामले को और संदिग्ध बनाता है स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय कर्मी शनि भगत का बयान। जिन्होंने बताया कि जिस निजी नर्सिंग होम में महिला की मौत हुई है, उसका लाइसेंस आईटीआई फील्ड के पास के लिए जारी है, जबकि अस्पताल नया बाजार इलाके में संचालित हो रहा था। ऐसे में सवाल उठ रहा है! कि जब यह जानकारी स्वास्थ्य विभाग को पहले से थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

 सिर्फ बयान जमीन पर कुछ नही !

जिला सूचना एवं जनसंपर्क पदाधिकारी अमित कुमार ने मामले की जांच रिपोर्ट मांगे जाने और कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। लेकिन ऐसे आश्वासन पहले भी कई बार दिए जा चुके हैं। लेकिन जमीन पर कार्रवाई कुछ नही हुआ !

गौरतलब है कि निजी नर्सिंग होम में लापरवाही से मौत का यह पहला मामला नहीं है। जिले में पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां गरीब और कमजोर परिवारों को डराकर या पैसों के दम पर चुप करा दिया गया। अब सवाल साफ है— बक्सर में स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए है या कमीशनखोरी के लिए? अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मौत का खेल यूँ ही चलता रहेगा।

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