बक्सर में नई राजनीति का मूलमंत्र पसीना नही पोस्ट बहाओ ! काम नही कॉमेंट गिनाओ !

ज़मीन पर सन्नाटा, फेसबुक पर तूफान: बक्सर में लाइक से चल रही है राजनीति ! दिल्ली–कोलकाता–मणिपुर से बरस रहा है नेताजी पर “डिजिटल प्रेम”विधायक बनते ही मुख्यमंत्री बनने की रील, जनता अब भी सड़क ढूंढ रही फेक आईडी की फौज, असली समर्थक लापता! लोकतंत्र ऑफलाइन है, नेताजी ऑनलाइन!


बक्सर—बिहार की राजनीति ने इन दिनों ऐसा डिजिटल छलांग मारी है कि ज़मीन पर खड़े लोग ऊपर देखने लगे हैं—कहीं बादल से नेताजी न टपक पड़ें। बक्सर इसका जीता-जागता उदाहरण बन गया है। यहां राजनीति अब गलियों, चौपालों और खेत-खलिहानों में नहीं, बल्कि फेसबुक की टाइमलाइन और इंस्टाग्राम की रीलों में हो रही है। ज़मीन पर पसरा सन्नाटा और मोबाइल स्क्रीन पर गूंजती जय-जयकार—यही आज की “नई राजनीति” है।

लाइक कॉमेंट्स पढ़ने में व्यस्त है नेता जी !

नेताजी दिन में गांव नहीं, दिनभर नोटिफिकेशन देखते हैं। जैसे ही कोई पोस्ट डाली, दिल्ली, कोलकाता, मणिपुर, असम से लाइक-कमेंट की ऐसी बारिश होती है कि मानो बक्सर नहीं, किसी मल्टीनेशनल प्रोजेक्ट का उद्घाटन हो रहा हो। “नेताजी जिंदाबाद”, “बक्सर की शान”, “भविष्य के मुख्यमंत्री” जैसे कमेंट पढ़कर लगता है कि जनता का सारा दुख-दर्द अब इमोजी में बदल गया है। लेकिन हकीकत यह है कि जिन मोहल्लों में नाली उफनाई है, जहां सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं, जहां किसान यूरिया के लिए लाइन में खड़ा है! जंहा किसानों का अरमान पानी मे सड़ रहा है—वहां नेताजी की परछाईं तक नहीं दिखती।

नेता जी का दरकता जनाधार तकनीक बना तारणहार !

राजनीति में जब जनाधार दरकता है, तब तकनीक सहारा बनती है—लेकिन बक्सर में तकनीक नहीं, ट्रिक चल रही है। फेक आईडी का ऐसा जाल बुना गया है कि खुद नेताजी भी कन्फ्यूज हैं कि असली समर्थक कौन है और डिजिटल परछाईं कौन। “राजू शर्मा, दिल्ली” अचानक बक्सर की राजनीति का विश्वकोश बन जाता है। “स्नेहा बोस, कोलकाता” स्थानीय समस्याओं पर ऐसे ज्ञान देती हैं मानो बचपन से किला रामरेखा घाट एवं शांति नगर में पली-बढ़ी हों। असम और मणिपुर के प्रोफाइल से बक्सर के लिए इतना प्रेम उमड़ता है कि गंगा भी शर्म से शर्मा जाए।

ग्राफ से नापा जा रहा है नेता जी का आत्मविश्वास !

नेताजी का आत्मविश्वास अब जमीन से नहीं, ग्राफ से नापा जा रहा है। लाइक बढ़े तो हौसला सातवें आसमान पर, कम हुए तो पोस्ट डिलीट। विधायक बनते ही मुख्यमंत्री बनने की रील तैयार—बैकग्राउंड म्यूजिक दमदार, डायलॉग उससे भी दमदार: “हम एक्शन लेते हैं तो रिएक्शन होता है।” उधर खेतों में धान सड़ रहा है, कृषि फीडर आंख-मिचौली खेल रहा है, पानी-सड़क-रोजगार जनता की रोज़मर्रा की लड़ाई बने हुए हैं। मगर नेताजी का भरोसा पब्लिक पर नहीं, पिक्सल पर है।

कभी नेताओ के दरवाजे पर लगता था दरबार !

कभी बक्सर में नेताओं के दरवाजे पर सुबह से शाम तक दरबार लगता था। फरियादें होती थीं, बहस होती थी, समाधान निकलते थे। अब दरवाजे पर ताला और मोबाइल पर लाइव। “जनता से जुड़े” पोस्ट के साथ नेताजी खुद के सबसे बड़े फैन बने बैठे हैं। नई राजनीति का मंत्र साफ है—पसीना नहीं, पोस्ट बहाओ; काम नहीं, कमेंट गिनाओ !

सड़के बदबू मार रही है! रील में नेताजी चमक रहे है!


चाय की दुकानों और गांव की चौपालों पर लोग हंसते हुए सवाल पूछ रहे हैं—जो नेता सड़क पर नहीं दिखता, वह रील में कैसे चमक रहा है? जो समस्या सुनने के बजाय लाइव आकर बॉन्डिंग करता है, उससे न्याय की उम्मीद कैसे करें? अब तक कितनी समस्याओं का समाधान हुआ—इस पर सन्नाटा है, लेकिन व्यूज़ पर तालियां खूब हैं। आरोप-प्रत्यारोप, डील और रील—सब एक ही स्क्रीन पर समाए हुए हैं।

गैरतलब है कि बक्सर की जनता बेवकूफ नहीं है। वह जानती है कि लोकतंत्र लाइक से नहीं, लोगों से चलता है। चुनाव इमोजी से नहीं, भरोसे से जीते जाते हैं। इसलिए जनता जवाब नहीं, इंतजार कर रही है—उस दिन का, जब नेताजी मोबाइल से नजर हटाकर फिर से जनता की तरफ देखेंगे। वरना इतिहास गवाह है—जो नेता जमीन भूल जाते हैं, वे भले ही सोशल मीडिया पर ट्रेंड करें, अंत में जमीन पर चारों खाने चित ही होते हैं। बक्सर की धरती सब देख रही है—जनाधार कब, कैसे और चुपचाप खिसक गया, इसकी हवा तक नहीं 

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