बंगाल और असम में बूथ कमिटी, बक्सर में टूटी सड़क: जासो रोड पर सिस्टम का फरेब उजागर ! मरम्मती के नाम पर मलाई, दो दिन में उखड़ती सड़क और बहानों की बरसात! जनता के सवालों से भागते ‘बड़का साहब’, अफसरों की जुबान पर झूठ की परतें ! शिकायत पर कार्रवाई नहीं, संवेदक बचाओ अभियान में जुटा विभाग सीएम से शिकायत की तैयारी, जासो रोड बन गई 2025 की सियासी बारूद!
बक्सर- गोलम्बर से जासो नंदाव–जगदीशपुर, कुल्हड़िया बसवली होते हुए डुमराँव तक जाने वाली 15 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़क आज सिर्फ कंक्रीट और गिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता, राजनीतिक प्राथमिकताओं और विभागीय फरेब की जिंदा मिसाल बन चुकी है। यह वही सड़क है जिसे इलाके की लाखों आबादी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की लाइफ लाइन मानती है—स्कूल, अस्पताल, बाजार, खेती और रोजगार सब इसी रास्ते से जुड़े हैं। लेकिन आज यही लाइफ लाइन दम तोड़ती दिख रही है।
इस सड़क ने बदल दी दो बड़े सियासतदान !
जोर लगा के हइया करने को मजबूर है जनता !
विडंबना यह है कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में यही सड़क सियासत का ऐसा मुद्दा बनी कि डुमराँव और बक्सर विधानसभा के दो दिग्गजों को धूल चटा दी। चुनावी भाषणों में इस सड़क पर खड़े होकर विकास के बड़े-बड़े जुमले उछाले गए, लेकिन चुनाव बीतते ही सड़क भी बीतती उम्मीदों की तरह उखड़ने लगी। कायाकल्प के नाम पर जो हो रहा है, वह मरम्मत नहीं बल्कि जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा ही गन्दा मजाक है!
मरम्मत के नाम पर फरेब !
देख लीजिए बड़का साहब भ्र्ष्टाचार की लाइफे लाइन !
2021 में हुए कालीकरण के बाद से मेंटेनेंस के नाम पर हर साल कोरम पूरा किया जा रहा है। असली मकसद साफ दिखता है—पांच साल पूरे होते ही जमा सिक्योरिटी मनी निकालना। नतीजा यह कि जहां-जहां मरम्मत की गई, वहां दो दिन में सड़क ऐसे उखड़ रही है जैसे किसी ने कालीन बिछाकर तुरंत समेट लिया हो। हालात यह हैं कि कालीकरण की परत लोग मुट्ठी में समेट कर दिखा रहे हैं।
दलीलों की दनादन कथा !
जब इस बदहाली पर सवाल उठे तो आरडब्ल्यूडी के एसडीओ शशि कुमार की दलीलें किसी व्यंग्य कथा से कम नहीं रहीं। पहले कहा गया—“लोगों ने पानी डालकर सड़क उखाड़ दी।” फिर बताया गया कि जहां उखड़ी है वहां कोई मकान ही नहीं, तो जवाब बदला—“घुमावदार सड़क पर ऐसा होता है।” जब यह भी गलत साबित हुआ तो नया बहाना आया—“नंदाव रेल फाटक बंद था, मिक्सचर ठंडा हो गया।” वीडियो और तस्वीरें भेजने के बाद, जहां कोई रेल फाटक था ही नहीं, तब आखिरकार संवेदक को ब्लैक लिस्ट करने की घोषणा कर दी गई। सवाल यह है कि अगर सब कुछ इतना साफ है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं? इसके पीछे की असली खेल क्या है?
बंगाल और आसाम में व्यस्त है बड़का साहब !
इधर जनता अपने बड़का साहब से सवाल पूछ रही है, लेकिन “बयानों के शूरवीर” क्षेत्र छोड़कर बंगाल और असम में बूथ कमिटी बनाने में व्यस्त हैं। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि साहब की नजर 2029 के लोकसभा चुनाव पर है, छोटा क्षेत्र छोटी कुर्सी उनके लिए “ऊंट के मुंह में जीरा” है। शायद यही वजह है कि गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध ली जाती है और कमजोर आवाजों को गालियां मिलती हैं।
ग्रामीण खुद लड़ेंगे अपनी लड़ाई !
अब सब्र का बांध टूट रहा है। सीएम की प्रस्तावित समृद्धि यात्रा से पहले ग्रामीण लिखित शिकायत की तैयारी में जुट गए हैं। जगदीशपुर पंचायत की नम्रता देवी कहती हैं—“झूठे वादों से वोट लेने वाले अब सोशल मीडिया की तस्वीरों में ही दिखते हैं। जब नेता नहीं लड़ेंगे, तो अब हम खुद अपनी लड़ाई लड़ेंगे।”
गौरतलब है कि जासो–डुमराँव मुख्य पथ की पांच साल की अवधि इस साल पूरी हो रही है। रखरखाव की सिक्योरिटी मनी निकालने की हड़बड़ी में जनता को गड्ढे, धूल और धोखे दिए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सच्चाई सबके सामने है, तो विभाग कार्रवाई की जगह पट्टी क्यों पढ़ा रहा है? जवाब शायद सड़क पर नहीं, बल्कि सिस्टम की उस परत में छिपा है जहां फरेब, मिलीभगत और राजनीतिक चुप्पी एक साथ चलते है !






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