18 किमी की सड़क बनी सियासी शवयात्रा!”“वोट लेकर गायब विधायक जी! जनता बोली—‘लोकेशन ऑन करो बड़े साहब!’”

18 किमी की सड़क बनी सियासी शवयात्रा!”“वोट लेकर गायब विधायक जी! जनता बोली—‘लोकेशन ऑन करो बड़े साहब!’” “5 महीने में जनसेवक से ‘प्रोटोकॉल साहब’ बनने का सफर पूरा!” “सड़क से ज्यादा सड़ चुकी है बक्सर में राजनीति की नीयत!” “बक्सर में ‘बहेलिया’ शब्द से मचा सियासी घमासान—कौन है बहेलिया? शिकार बनी मासूम जनता!”

बक्सर – जिले के सदर विधानसभा क्षेत्र की 18 किलोमीटर लंबी गोलम्बर–जासो–भाया–नदाव–जगदीशपुर–कुल्हड़िया–बसौली–डुमरांव मुख्य सड़क अब सिर्फ गड्ढों की वजह से नहीं, बल्कि सियासत की गिरती साख की वजह से चर्चा में है। यह वही सड़क है जो चुनाव के समय “विकास का एक्सप्रेसवे” बनकर पोस्टरों में चमक रही थी, भाषणों में दौड़ रही थी और सोशल मीडिया पर उड़ रही थी! लेकिन आज हकीकत यह है कि यह सड़क नहीं, बल्कि वादों का मलबा और सियासत की शवयात्रा बन चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है की—पहले सड़क टूटी थी, अब जनता का भरोसा भी चकनाचूर हो गया है।

“पेरिस-लंदन जैसा एक्सप्रेसवे” बना गड्ढों का गड्ढा !

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में दो विधानसभा क्षेत्रों को जोड़ने वाली इस सड़क को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया गया। दावा था—“पेरिस और लंदन जैसे एक्सप्रेसवे” का! तस्वीरें थीं, वीडियो थे, वादों की बारिश थी… और जनता ने भरोसा कर वोट भी दे दिया। लेकिन चुनाव जीतने के महज 5 महीने बाद ही सारी तस्वीर साफ हो गई—ना सड़क बनी, ना वादे पूरे हुए, ना नेता लौटे ! जिस सड़क के सहारे नेता जी विधानसभा पहुंच गए, उसी सड़क पर उनके कदम तक नहीं पड़े।अब गांव-गांव में एक ही सवाल गूंज रहा है—“वोट बक्सर के लिए दिया था या असम-बंगाल के प्रचार के लिए?”

“सड़क नहीं, सड़ चुकी है सियासत!”

जसो रोड किनारे बैठे बुजुर्ग लालबिहारी की बात सीधे दिल में उतरती है—“सड़क तो पहले भी खराब थी, लेकिन अब राजनीति की बदबू ज्यादा आ रही है।”यह दर्द सिर्फ गड्ढों का नहीं, सिस्टम का है। बीमारी में अस्पताल जाना जंग जीतने जैसा हो गया है, और वहां अस्पताल में भी इलाज से ज्यादा चर्चा “गायब विधायक” की होती है। लोग पूछ रहे हैं—“हाजिरी बनाकर कहां गायब हो गए डायनेमिक विधायक जी?”

फोन स्विच ऑफ, जनता ऑन वेटिंग

जनता का आरोप साफ है—जनसेवक अब “वीआईपी साहब” बन चुके हैं। फोन उठाना तो दूर, कार्यकर्ताओं तक को भी समय नहीं दे रहे है! सदर क्षेत्र के युवा अधिवक्ता अयोध्या यादव तंज कसते हैं—“अब हम केस नहीं, साहब की लोकेशन ढूंढ रहे हैं!”चाय की दुकानों पर बहस का तापमान हाई है—“पहले वोट मांगने रोज आते थे, अब कॉल भी रिसीव नहीं करते… लगता है जनता से बात करना ‘प्रोटोकॉल के खिलाफ’ हो गया है।”

जुमलों की जीत, जनता की हार?

चुनाव में वादों की आंधी थी, अब सवालों का तूफान है।सोशल मीडिया पर वही सड़क फिर वायरल है, लेकिन कैप्शन बदल चुका है ! “विकास नहीं, धोखे का एक्सप्रेसवे!” जनता का कहना है—जुमलों ने चुनाव जिताया, लेकिन जमीनी सच्चाई ने अब परतें खोल दी हैं।

बहेलिया’ की एंट्री और सियासी बवाल!

इसी बीच राजनीति में पैठ रखने वाला बीजेपी के एक युवा नेता की पोस्ट—“बहेलिया आएगा” चार दिन बाद फुर्र हो जाएगा !—ने जिले की राजनीति में भूचाल ला दिया ! यह शब्द तीर की तरह चला और कई चेहरों पर जाकर लगा। इसके बाद शुरू हुआ—सफाई, बयानबाजी और अंदरखाने बैठकों का दौर ! अब लड़ाई सड़क की नहीं, सियासी सेटिंग की हो गई !और आरोप है कि आवाज उठाने वालों को “सेट” कर  खामोश किया जा रहा है! इस बीच असली मुद्दे गायब हैं—किसान धान नहीं बेच पाया ! युवा बेरोजगार है सड़को पर भटक रहा है!  आम आदमी सिस्टम में पिस रहा है! और जनप्रतिनिधि? दूसरे राज्यों के चुनाव में व्यस्त बताए जा रहे हैं।

 अब सड़क नही सवाल खड़ा है?

यह 18 किलोमीटर की सड़क अब सिर्फ रास्ता नहीं, सियासत का आईना बन चुकी है। यह दिखा रही है कि वादे कितनी जल्दी धूल में मिलते हैं और जनता कितनी तेजी से सब समझ जाती है। सबसे बड़ा सवाल अब यही है—“बहेलिया कौन है… और किसने जनता की उम्मीदों का शिकार किया?”

जिंदगी की लाइफलाइन बनी लाचारी !

दर्जनों गांवों के लिए यह सड़क जीवन रेखा है। लोग रोज इसी रास्ते से रोजगार के लिए शहर जाते हैं।विडंबना देखिए— जिस सड़क ने नेताओं की किस्मत बदल दी, वही आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।और जनता पूछ रही है—“जब बनाना ही नहीं था… तो झूठे वादों की बारिश क्यों की गई?”यह सड़क अब सिर्फ गड्ढों से भरी नहीं है… यह भरोसे के टूटे टुकड़ों से भरी है।

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