मैं बक्सर बोल रहा हूँ ! इतिहास चमका रहा है, वर्तमान गर्त और भविष्य अंधकार में भटक रहा है ! मैं बक्सर बोल रहा हूँ ! वादे मिले हजार, हकीकत में बदहाली अपार! कभी अयोध्या तो कभी काशी, कभी मथुरा तो कभी वृंदावन के नाम पर ठगे जा रहा हूँ ! मैं बक्सर बोल रहा हूँ !

 मैं बक्सर बोल रहा हूँ ! इतिहास चमका रहा है, वर्तमान गर्त और भविष्य अंधकार में   भटक रहा है ! मैं बक्सर बोल रहा हूँ !  वादे मिले हजार, हकीकत में बदहाली अपार! कभी अयोध्या तो कभी काशी, कभी  मथुरा तो कभी वृंदावन के नाम पर ठगे जा रहा हूँ ! मैं बक्सर बोल रहा हूँ ! किसान परेशान, शिक्षा लाचार और स्वास्थ्य बेबस यही है विकास का सच? कागजों में चमकता बजट, जमीन पर टूटा हुआ भरोसा! इतिहास का गौरव बचा रहा हूँ,  वर्तमान पूछ रहा  मेरा कसूर क्या है? मैं बक्सर बोल रहा हूँ… 36 साल बाद भी अधूरी है मेरी विकास की कहानी !

बक्सर- मैं बक्सर बोल रहा हूँ…”गंगा के पावन तट पर बसी वह ऐतिहासिक नगरी, जिसने भारत के इतिहास और आस्था दोनों को दिशा दी। 17 मार्च 1991 को जब मुझे जिला बनाया गया, तब लोगों की उम्मीदें आसमान छू रही थीं। लगा था कि प्रशासनिक पहचान के साथ विकास भी मेरे दरवाजे पर दस्तक देगा। लेकिन आज 36 साल बाद मैं खुद से ही पूछ रहा हूँ!  क्या सच मे मैं बक्सर बोल रहा हूँ ? क्या मैंने जिला बनने के बाद सच में कुछ पाया, या सिर्फ उम्मीदें ही खोता रहा? इतिहास मेरे पास बहुत है, लेकिन वर्तमान अक्सर खाली हाथ दिखाई देता है। खेतों की मिट्टी रो रही है! 

अन्नदाताओं के दरकते सपने !


मैं कृषि प्रधान जिला हूँ। मेरी धरती हर साल अनाज उगाती है, लेकिन मेरे किसान आज भी संघर्ष की खेती कर रहे हैं। कभी बाढ़ उनकी मेहनत बहा ले जाती है, तो कभी सूखा उम्मीदें जला देता है। सिंचाई की योजनाएं फाइलों में बनती हैं, लेकिन खेत तक पानी पहुंचते-पहुंचते योजनाओं की सांस टूट जाती है। किसानों को समय पर बीज, खाद और सही दाम मिलना आज भी सपना ही लगता है। मेरे गांवों का किसान अक्सर यही कहता है—“फसल हमारी, मेहनत हमारी… लेकिन फायदा किसी और का।” अन्नदाताओं के दरकते सपने सिस्टम का पोल खोल रहा है ! 

 ज्ञान की धरती पर अज्ञान का साया

कहा जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम ने मेरी धरती पर महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी। लेकिन आज मेरे कई सरकारी स्कूलों की हालत देखकर लगता है कि शिक्षा भी संघर्ष कर रही है। कहीं एक कमरे में कई कक्षाएं चल रही हैं, कहीं शिक्षक कम हैं तो कहीं संसाधन। के नाम पर लूट मचा है! बच्चों की आंखों में सपने तो हैं, लेकिन उन्हें उड़ान देने वाली व्यवस्था अक्सर कमजोर नजर आती है कभी -कभी लगता है कि ज्ञान की भूमि पर भी व्यवस्था की लापरवाही भारी पड़ गई है।

अस्पतालों में उम्मीदें भी बीमार!

स्वास्थ्य व्यवस्था की कहानी भी कुछ अलग नहीं है।सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ है, लेकिन सुविधाएं सीमित हैं। ग्रामीण इलाकों के कई स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ नाम के लिए खुले हैं। दरवाजे में ताला बंद पड़ा है! मानो स्वास्थ्य महकमा खुद भेंटीलेटर पर सो रहा है। डॉक्टरों और दवाओं की कमी के कारण गरीब मरीजों को अक्सर शहर या निजी अस्पतालों की तरफ भागना पड़ता है। कभी-कभी लगता है कि बीमारी से पहले व्यवस्था ही मरीज बन चुकी है।

जिला मुख्यालय की  सड़कों पर सवाल !

मेरे शहर में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।करोड़ों के बजट की घोषणाएं भी होती हैं, लेकिन जब लोग सड़कों, नालों और कचरे की स्थिति देखते हैं तो सवाल खुद-ब-खुद उठने लगते हैं। कचड़ा प्रबंधन आज भी चुनौती बना हुआ है। नालों की गंदगी गंगा तक पहुंच रही है और शहर का सीना हर दिन बदबू से कराह रहा है। बड़का - बड़का साहब आंखे बंद कर ऐसी रूम में सपने सजा रहे है! “बक्सर में विकास का रास्ता शायद फाइलों से होकर जाता है, जमीन तक पहुंचते - पहुंचते थक जाता है।”

इतिहास की चमक, वर्तमान की धुंध!

मैं वही बक्सर हूँ, जिसने चौसा और बक्सर के ऐतिहासिक युद्ध देखे। मैं वही धरती हूँ, जहां पंचकोशी यात्रा हर साल लाखों श्रद्धालुओं को बुलाती है। लेकिन विडंबना देखिए—इतिहास चमक रहा है और वर्तमान अक्सर संघर्ष करता दिखाई देता है।

 36 साल बाद भी वही सवाल

जिला बनने के 36 साल बाद आज मेरी जनता सिर्फ एक जवाब चाहती है क्या मैं सिर्फ इतिहास की किताबों में ही महान रहूँगा? या फिर कोई ऐसा दिन भी आएगा जब मेरी पहचान विकास, शिक्षा, खेती और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था से भी होगी? क्योंकि अब मेरी आवाज साफ सुनाई दे रही है—“मैं बक्सर बोल रहा हूँ….इतिहास मेरा गर्व है, वर्तमान अंधकार !

Post a Comment

0 Comments