कहाँ हैं बक्सर के ‘बड़का साहेब’? ये सवाल अब प्रशासनिक फाइलों से निकलकर चाय की दुकानों, चौक-चौराहों और मोबाइल स्क्रीन पर ट्रेंड करने लगा है। हालात ऐसे हैं कि साहेब की खोज अब सरकारी तंत्र नहीं, बल्कि फेसबुकिया खुफिया विभाग और व्हाट्सएपिया अनुसंधान समिति कर रही है। “लापता हैं साहेब, मिले तो टैग करें” कुछ ऐसा ही माहौल जिला मुख्यालय में बना हुआ है। सेवादार बेचारे पोस्ट डाल-डालकर पूछ रहे हैं—“किसी ने देखा क्या?”
‘प्रवासी पक्षी’ बनाम ‘बहेलिया’ थ्योरी !
सोशल मीडिया यूजर ने साहेब को “बहेलिया” बताया—चार दिन आते हैं, जाल बिछाते हैं और फिर उड़ जाते हैं। दूसरे ने उन्हें “प्रवासी पक्षी” घोषित कर दिया—मौसम देखकर आते हैं, माहौल गर्म होते ही उड़ जाते हैं। अब बक्सर की जनता कन्फ्यूज है! साहेब शिकार करने आए थे या सर्वे करने? और अगर पक्षी हैं, तो क्या अगली बार GPS टैगिंग करानी पड़ेगी?
‘फोन कॉल’ वाला लोकतंत्र !
जैसे ही बहेलिया वाला तीर लगा, साहेब का “डायरेक्ट डेमोक्रेसी मॉडल” एक्टिव हो गया— फोन घनघनाया और युवक को ऐसा ज्ञान मिला कि उसने पोस्ट ही डिलीट कर दिया। ऑडियो वायरल है, और संदेश साफ“अभिव्यक्ति की आज़ादी है… लेकिन सीमित डेटा पैक के साथ!”
सफेदपोश किसान का ‘वैज्ञानिक विश्लेषण’ !
‘एंट्री-एग्जिट पॉलिटिक्स’ का नया मॉडल !
बक्सर में अब नई राजनीतिक थ्योरी चल पड़ी है “काम कम कैमियो ज्यादा” एंट्री: सायरन, काफिला, स्वागत! एक्ट: भाषण, फोटो, भरोसा एग्जिट: “जल्द ही फिर आएंगे”और इसी के साथ फिर… सीजन खत्म!
सेवादारों का सवाल सीधा!
साहेब सेवा में हैं या सिर्फ “लोकेशन ऑन-ऑफ” मोड में? विकास फाइल में हो रहा है या सिर्फ विजिट शेड्यूल में?और सबसे बड़ा सवाल क्या अगली बार साहेब के लिए ‘Live Location Share’ जरूरी किया जाए का पोस्ट डालना पड़ेगा ? फिलहाल बक्सर में ‘गायब साहेब’ एक ऐसा मिस्ट्री शो बन चुके हैं, जिसका ट्रेलर रोज आता है…पर फुल एपिसोड कभी नहीं!


0 Comments