“विधायकी ऑन रोड: सड़क बनी ‘स्पॉट कोर्ट’!” “वीडियो में एक्शन, बयान में रिएक्शन!” ! “स्लिप ऑफ टंग से लेकर स्लिप ऑफ सिचुएशन तक!” “ कानून बोले– मुझे भी थोड़ा काम करने दीजिए!” ! “जनता पूछे: न्याय या नज़ारा?”
बक्सर- जिले की सियासत इन दिनों किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लग रही। डुमराँव विधानसभा क्षेत्र के विधायक राहुल सिंह एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं—और वजह वही पुरानी, “कुछ अलग करने” की आदत। फर्क बस इतना है कि इस बार मंच विधानसभा नहीं, बल्कि सड़क बन गई।
सुर्खियों में है विधायक जी !
कहानी शुरू होती है एक वायरल वीडियो से। दृश्य कुछ यूं है—सड़क किनारे एक युवक, पास में खड़े विधायक जी, और एक तीसरा व्यक्ति जो युवक पर हाथ साफ करता नजर आता है। बैकग्राउंड में अंगरक्षक भी मौजूद, मानो पूरा सेटअप पहले से तैयार हो। सोशल मीडिया पर वीडियो आया, और फिर क्या—लाइक, शेयर, कमेंट की बरसात शुरू।
जनता की व्यंगात्मक सवाल !
अब जनता है, तो सवाल भी होंगे। किसी ने कहा—“ये जनप्रतिनिधि हैं या जज साहब?” तो किसी ने तंज कसा—“नई न्याय व्यवस्था: ऑन-द-स्पॉट फैसला!” कुल मिलाकर, वीडियो ने विधायक जी को फिर से ट्रेंडिंग लिस्ट में ला खड़ा किया।
जदयू विधायक ने रखी अपना पक्ष !
हालांकि, कहानी का दूसरा पहलू भी है—और वो खुद विधायक जी ने बताया। उनका कहना है कि मामला छेड़खानी का था। एक लड़की के साथ गलत व्यवहार हो रहा था, और वे विरोध करने के लिए गाड़ी से उतरे थे। सवाल उठता है—क्या विरोध का मतलब मौके पर ही ‘एक्शन सीन’ बनाना है, या फिर कानून को अपना काम करने देना? विधायक जी का तर्क है—“महिला सुरक्षा कब से अपराध हो गया?” बात में दम है, लेकिन तरीका वही पुराना सवाल खड़ा करता है—क्या जनप्रतिनिधि अब ‘फील्ड पुलिस’ की भूमिका में भी आ गए हैं?
सदन के दौरान भी स्लिप ऑफ टंग का शिकार हुए थे विधायक जी !
यह पहला मौका नहीं है जब विधायक जी सुर्खियों में आए हों। हाल ही में विधानसभा के बजटीय सत्र में उनका एक बयान भी खूब वायरल हुआ था—“जब मैं पांच साल का था, तब पांचवीं क्लास में पढ़ता था।” इस पर उन्होंने सफाई दी थी कि यह “स्लिप ऑफ टंग” था। अब जनता कह रही है—“स्लिप ऑफ टंग तो समझ आ गया, ये स्लिप ऑफ सिचुएशन क्या है?”
वीडियो बनाने वाले ने भी बताई वीडियो की सच्चाई !
इधर, वीडियो बनाने वाले शख्स की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। उसने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि वह बस अपने वाहन से गुजर रहा था और यह दृश्य कैमरे में कैद हो गया। डर इतना कि पहचान उजागर होने पर शहर में रहना मुश्किल हो सकता है। यानी वीडियो से ज्यादा चर्चा उस डर की है, जो कैमरे के पीछे खड़ा है।
सोशल मीडिया में ट्रोल हो रहे है विधायक जी !
सोशल मीडिया की अदालत में तो फैसला लगभग आ चुका है। लोग कह रहे हैं—अगर वाकई छेड़खानी हुई थी, तो आरोपी को पुलिस के हवाले करना चाहिए था। खुद ही ‘न्यायाधीश’ बन जाना क्या सही तरीका है? अब सबकी नजर उस “ओरिजनल वीडियो” पर है, जिसका वादा विधायक जी ने किया है। कहा जा रहा है कि रेलवे के सीसीटीवी में पूरी घटना कैद है। यानी अगला एपिसोड जल्द आने वाला है—और दर्शक पहले से ही उत्सुक हैं।
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका क्या होनी चाहिए—नीति बनाने की या मौके पर न्याय करने की? क्योंकि लोकतंत्र में कैमरे भले ही कई हों, लेकिन कानून की नजर एक ही होती है—और वो देर से सही, पर देखती सब है।



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