तीर चला गठबंधन में, कमल हुआ कन्फ्यूज!” “समृद्धि के मंच पर किसने कर दी ‘सियासी सेटिंग’, किसकी लगी लॉटरी?” “साथ हैं… पर पास नहीं!

  “तीर चला गठबंधन में, कमल हुआ कन्फ्यूज!” “समृद्धि के मंच पर किसने कर दी ‘सियासी सेटिंग’, किसकी लगी लॉटरी?” “साथ हैं… पर पास नहीं! बक्सर में बड़ा सवाल” ! “पास का खेल बड़ा निराला—अपना बाहर, पराया अंदर वाला!” “गठबंधन की गाड़ी में किसने दे दिया झटका, ड्राइवर भी है अटका!”

बक्सर। - समृद्धि यात्रा का मकसद था विकास का संदेश देना, लेकिन बक्सर में यह यात्रा सियासी गणित का लाइव डेमो बन गई। मंच पर भाषण कम और “पास” की चर्चा ज्यादा हो रही है। हालात ऐसे हैं कि सहयोगी दलों के बीच की खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है—और जनता पूछ रही है, “ये समृद्धि है या रणनीति?”

पास बना सियासी पासा !

पूरा विवाद कार्यक्रम के पास वितरण से शुरू हुआ। आरोप है कि जदयू के दो विधायकों ने पास बांटने में ऐसा “संतुलन” बनाया कि अपने ही कार्यकर्ता संतुलन से बाहर हो गए और भाजपा के कई नेता अंदर फिट हो गए। अब इसे सियासी उदारता कहें या रणनीतिक चाल—यह बहस का विषय बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर जदयू के नेताओं ने भी पलटवार किया है। उनका कहना है कि पार्टी के अंदर जो सियासी आग सुलग रही थी, उसमें सहयोगी दल के कुछ नेताओं ने घी डालने का काम किया है। यानी मामला सिर्फ “पास” का नहीं, बल्कि “पासा” का भी है—जो किसके पक्ष में गिरा, यही असली खेल है।

किसने फेंका सियासी पासा?


सूत्रों की मानें तो कुछ नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को किनारे कर दूसरे दल के लोगों को ज्यादा जगह दे दी। नतीजा यह हुआ कि कार्यक्रम में एक तरफ भीड़ उम्मीद से ज्यादा दिखी, तो दूसरी तरफ कार्यकर्ता गेट के बाहर ही “समृद्धि” का इंतजार करते रह गए। बस फिर क्या था—नाराजगी ने सियासी तापमान को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। सोशल मीडिया पर भी यह नाराजगी खूब छलकी। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तंज कसते हुए लिखा—“अब पास भी मेहनत से नहीं, ‘मैनेजमेंट’ से मिलते हैं।” कुछ ने तो इसे “पास नहीं, पावर का प्रदर्शन” तक बता दिया।

पुराना है ये ‘पास पुराण’!

यह पहली बार नहीं है जब इस तरह के आरोप लगे हों। 2025 के बिहार विधानसभा  चुनाव के दौरान भी मंच पर जगह देने को लेकर सवाल उठे थे। तब मामला परिणाम आने के बाद ठंडा पड़ गया था, लेकिन अब वही कहानी नए अध्याय के साथ फिर सामने आ गई है। इस बार आरोप यह भी है कि “प्राथमिकता” का पैमाना कुछ ज्यादा ही लचीला हो गया। सूत्र बताते हैं कि प्रशासन ने पहले ही सीमित संख्या में नाम मांगे थे—मंच, दर्शक दीर्घा और हेलीपैड के लिए अलग-अलग सूची तय थी। लेकिन अंतिम सूची में बदलाव और कुछ नामों के गायब होने से कई नेताओं के समर्थक नाराज हो गए। खासकर वे चेहरे, जो “लगभग पक्का” माने जा रहे थे, मंच पर नजर ही नहीं आए।

जदयू की सफाई भी कम दिलचस्प नहीं

जदयू नेताओं ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि यह सब माहौल खराब करने की साजिश है। उनके मुताबिक, जिन लोगों को पास मिला, वे सभी अधिकृत कार्यकर्ता थे और किसी तरह का भेदभाव नहीं किया गया। अब सच क्या है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन बयानबाजी ने माहौल जरूर गर्म कर दिया है।

समृद्धि यात्रा बनाम सियासी गणित

फिलहाल बक्सर में “समृद्धि यात्रा” से ज्यादा “सियासी गणित” की चर्चा है। जोड़-घटाव, गुणा-भाग सब चल रहा है—कौन अंदर, कौन बाहर, और किसका कितना असर! दिलचस्प यह है कि भाजपा के कई बड़े नेताओं ने अपने ही जिलाध्यक्ष और वर्तमान विधायक पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यानी मामला अब सिर्फ सहयोगी दलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि घर के अंदर भी हलचल तेज हो गई है।

कुल मिलाकर, बक्सर में समृद्धि यात्रा ने विकास से ज्यादा राजनीति को गति दे दी है। अब देखना यह है कि यह “पास का खेल” यहीं थमता है या आगे और बड़े सियासी खेल की शुरुआत करता है। फिलहाल तो यही कहा जा रहा है—“यहां पास से ज्यादा पासा चल रहा है!”

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