संतोष निराला की सादगी और संगठन कौशल ने बढ़ाई एनडीए की उम्मीदें, एनडीए की सिंबल लेकर क्षेत्र में लौट रहे है संतोष निराला !

 राजपुर का रण – अनुभव बनाम भावनाओं की जंग!  एनडीए नेताओ ने अपने अनुभवी नेता बिहार सरकार के पूर्व मंत्री संतोष निराला पर जताया भरोसा ! संतोष निराला की सादगी और संगठन कौशल ने बढ़ाई एनडीए की उम्मीदें, एनडीए की सिंबल लेकर क्षेत्र में लौट रहे है संतोष निराला ! सोशल मीडिया बना रणक्षेत्र! 2025 में राजपुर की सियासत बनेगी बिहार की सबसे दिलचस्प लड़ाई का केंद्र बिंदु !

एनडीए  का सिम्बल लेकर राजपुर की जनता के बीच लौट रहे है संतोष निराला !

बक्सर-  जिले की राजपुर विधानसभा सीट एक बार फिर बिहार की सियासत का केंद्र बन चुकी है. 2025 के विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजते ही इस सीट पर मुकाबला रोमांचक हो गया है. जहां एनडीए अपने अनुभवी नेता और पूर्व मंत्री संतोष निराला के संगठन कौशल और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भरोसे मैदान में उतर रही है, वहीं कांग्रेस के मौजूदा विधायक विश्वनाथ राम अपने पांच वर्षों के कामकाज और इंडिया गठबंधन के नेताओ के सहारे जनता का दिल जीतने की कोशिश में है.

राजपुर विधानसभा क्षेत्र में बदलते रहता है चुनावी समीकरण !

राजपुर विधानसभा क्षेत्र  में राजनीतिक समीकरण हर चुनाव में बदलते रहे हैं, लेकिन इस बार जनता का रुख नेताओं के लिए उलझन भरा है. गांव-गांव और सोशल मीडिया तक फैली जनता की खामोशी ने इस बार के चुनाव को और रहस्यमय बना दिया है. एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद इस सीट पर प्रचार का संकेत देकर उन्होंने पहले ही राजपुर की जनता से आशीर्वाद मांगते हुए यहां का माहौल गर्मा दिया है. एनडीए नेताओ के हाथों से सोमवार को देर शाम  सिंबल मिलने के बाद क्षेत्र की जनता के साथ ही नेतृत्व के प्रति आभार प्रकट किया है. माना जा रहा है कि निराला के पक्ष में मुख्यमंत्री की सक्रियता से एनडीए को संगठनात्मक मजबूती का लाभ संतोष निराला को विषेश रूप से मिलेगी.

एनडीए का सिम्बल दिखाते पूर्व मंत्री

विश्वनाथ राम के दावे में कितना दम !

 वही दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक विश्वनाथ राम अपनी रिपोर्ट कार्ड राजनीति के जरिए जनता तक पहुंच बनाने की कोशिश में जुटे हैं. उनका यह दावा हैं कि उन्होंने वादों से ज्यादा काम किया है. रोजगार, सामाजिक न्याय और शिक्षा जैसे मुद्दों पर वे सीधे जनता से संवाद कर रहे हैं. वही स्थानीय लोग इस दावे को वादा खिलाफी बताकर सोशल मीडिया के माध्यम से अपना आक्रोश जता रहे है. जिसका बखूबी जवाब भी विधायक की डिजिटल सेना दे रही है. स्थानीय लोगो की माने राजपुर 202 सुरक्षित विधानसभा सीट है. पिछड़े समाज के नेता को ही जनता हर बार चुनती है. लेकिन पांच बर्ष के कार्यकाल में विधायक करोड़पति और जनता रोड़ पति बन जाती है. हमलोग  जाति या दल नहीं, बल्कि काम और कर्म के आधार पर निर्णय इसबार करेंगे!


क्या कहते है राजनीति के जानकार ?

हालांकि, चुनावी पंडितों का मानना है कि संतोष निराला की सादगी, सहज व्यवहार और जनसंपर्क क्षमता ने इस मुकाबले को और रोचक बना दिया है. उनके राजनीतिक अनुभव और संगठन के व्यापक नेटवर्क के कारण एनडीए का ग्राउंड कनेक्शन मजबूत दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि कई पंचायतों में निराला समर्थकों की सक्रियता स्पष्ट दिख रही है.वहीं, कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाए रखने की कोशिश में है. पार्टी ने अपने राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी के जनसंपर्क कार्यक्रमों को लेकर भी बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ की छवि ग्रामीण मतदाताओं के बीच असर डाली है.

 राजपुर में व्यक्ति बनाम प्रदर्शन की है लड़ाई !

 राजपुर के अलग -अलग क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों की माने तो इस सीट पर मुख्य संघर्ष व्यक्तित्व बनाम प्रदर्शन का है. एक ओर निराला का अनुभव, संगठन और सादगी है, तो दूसरी ओर विश्वनाथ राम का पांच बर्षो का लेखा जोखा. जिस राजपुर विधानसभा क्षेत्र के धनसोइ को प्रखण्ड का दर्जा दिलवाने का वादा कर 2020 के बिहार विधानसभा में विश्वनाथ राम ने बिहार सरकार के तत्कालीन परिवहन मंत्री को शिकस्त दी थी. न तो वह वादा पूरा हुआ और न ही वह जनता को समझा पाए. एक बार फिर उसी धनसोइ को प्रखण्ड बनाने का अटल प्रतिज्ञा कर चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे !  इस बार की लड़ाई भावनाओं और विश्वास की परीक्षा में बदल गई है. जनता विकास, बेरोजगारी और स्थानीय समस्याओं पर गंभीरता से सोच रही है. यही कारण है कि सोशल मीडिया पर नेताओं को मिल रहे मिश्रित प्रतिक्रियाएँ यह संकेत देती हैं कि इस बार “खामोश मतदाता” निर्णायक भूमिका निभा सकता है.


गौरतलब है कि राजपुर की लड़ाई सिर्फ एक विधानसभा सीट की नहीं, बल्कि यह बिहार की राजनीति में अनुभव बनाम पुराने वादों की जंग का प्रतीक बन गई है. आने वाले हफ्तों में प्रचार तेज होगा, वादे और भी बड़े होंगे, लेकिन असली फैसला उस “मौन जनता” के हाथ में है जो अब तक चुप है — पर निर्णायक है.

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