भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा पंचायत सरकार भवन, दीवारें बनीं रेत का ढेर ! करोड़ों की योजना में गुणवत्ता गायब, सिस्टम सवालों के घेरे में। 40% कमीशन की चर्चा, जिम्मेदार पदों पर चुप्पी का पहरा ! जांच के नाम पर औपचारिकता, जवाबदेही से बचते अधिकारी ! रातों-रात मरम्मत, नाकामी पर कामयाबी की परत चढ़ाने की कोशिश!
बक्सर — जिले के चौसा प्रखंड अंतर्गत सिकरौल पंचायत में निर्माणाधीन पंचायत सरकार भवन इन दिनों गंभीर सवालों के केंद्र में है। जिस भवन को ग्रामीण प्रशासन की मजबूती और सुशासन का प्रतीक माना जा रहा था, वही भवन अब व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता नजर आ रहा है। निर्माण के दौरान ही दीवारों का बालू की रेत की तरह टूटकर बिखर जाना न केवल निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर भी उंगली उठाता है।
बालू की रेत की तरह बिखर गया गांव की सरकार का पंचायत सरकार भवन!
स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये की इस योजना में शुरू से ही पारदर्शिता का अभाव रहा है। दीवारों में प्रयुक्त ईंटें कई जगहों पर हाथ लगाने मात्र से टूट रही हैं, जबकि मसाले में सीमेंट की मात्रा नाममात्र बताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, जिस अनुपात में बालू, गिट्टी और सीमेंट का उपयोग हो रहा है, वह किसी भी मानक निर्माण प्रक्रिया से मेल नहीं खाता। यही कारण है कि भवन की दीवारें निर्माण के शुरुआती चरण में ही जवाब देने लगी हैं।
मजदूरों और मिस्त्रियों की मजबूरी
पंचायत सरकार भवन में कार्यरत मजदूरों और राजमिस्त्रियों ने बताया कि उन्हें जो सामग्री और अनुपात तय करके दिया जाता है, उसी के अनुसार काम करना उनकी मजबूरी है। उनका कहना है कि बालू और गिट्टी की अधिकता के बीच सीमेंट बेहद सीमित मात्रा में मिलाई जा रही है। एजेंसी के निर्देशों के अनुसार ही मसाला तैयार किया जा रहा है, ऐसे में गुणवत्ता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनप्रतिनिधियों की खुली नाराज़गी
वर्तमान मुखिया बिनोद नट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह भवन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। उनका कहना है कि न तो भवन की रंगाई-पुताई हुई है, न ही फिनिशिंग पूरी है, लेकिन इसके बावजूद दीवारें टूटने लगी हैं। आगे निर्माण कार्य जारी है और पीछे से दीवारें रेत की तरह बिखर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतों के बावजूद कार्यपालक अभियंता, विभागीय जेई, एजेंसी और अन्य जिम्मेदार लोग कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाने में जुटे हैं।
दूध की रखवाली बिल्ली की जिम्मेवारी!
पूर्व मुखिया संजय राय ने भी प्रशासनिक व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा कि बड़े अधिकारी गहरी नींद में हैं और छोटे अधिकारियों ने निगरानी की जिम्मेदारी उन्हीं हाथों में सौंप दी है, जिन पर पहले से सवाल उठते रहे हैं। उनका कहना है कि जिस अधिकारी को जांच सौंपी गई है, वही इस पूरे प्रकरण की जड़ में बताया जा रहा है। ऐसे में निष्पक्षता की उम्मीद करना मुश्किल है। बिल्ली को ही जब दूध की रखवाली का जिम्मेवारी दे दी जाएगी तो क्या होगा यह बताने की जरूरत है?
प्रशासनिक प्रतिक्रिया में असहजता
जब इस मुद्दे पर जिला पंचायती राज पदाधिकारी सचिन कुमार से सवाल किया गया तो उन्होंने पहले किसी भी जानकारी से इनकार किया। वीडियो साक्ष्य दिखाए जाने पर उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वे इस विषय पर जवाब देने के लिए सक्षम पदाधिकारी नहीं हैं और जानकारी सूचना जनसंपर्क पदाधिकारी द्वारा दी जाएगी।
जांच पर गम्भीर सवाल !
इसके बाद जिला सूचना जनसंपर्क पदाधिकारी आलोक वत्स ने बताया कि विभागीय स्तर पर इस मामले की जांच के निर्देश दिए गए हैं और इसकी जिम्मेदारी कार्यपालक अभियंता, पंचायती राज विभाग को सौंपी गई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद विधिवत जानकारी साझा की जाएगी। जिसके बाद स्थानीय लोगो ने कई सवाल खड़ा करते हुए कहा की क्या इस पंचायत सरकार भवन की भ्र्ष्टाचार की जड़ में इनकी संलिप्तता नही है?
रातों-रात मरम्मत ने बढ़ाया संदेह
सबसे अहम पहलू यह रहा कि जैसे ही दीवारों के टूटने की खबर मीडिया के माध्यम से प्रशासन तक पहुंची, उसी रात आनन-फानन में दीवारों की जुड़ाई और मरम्मत शुरू कर दी गई। इससे स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि क्या यह सुधार की कोशिश थी या फिर खामियों पर पर्दा डालने का प्रयास।
जनहित और भरोसे का सवाल
पंचायत सरकार भवन केवल एक इमारत नहीं, बल्कि ग्रामीण जनता के विश्वास और प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होता है। यदि उसकी दीवारें ही कमजोर हों, तो व्यवस्था की मजबूती पर सवाल उठना लाज़मी है। अब देखना यह है कि जांच प्रक्रिया किस दिशा में जाती है और क्या यह मामला केवल मरम्मत तक सीमित रह जाता है या फिर सिस्टम में सुधार की कोई ठोस पहल सामने आती है। ग्रामीण जनता की नजरें अब जवाबों पर टिकी हैं।





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