साहब की नाक के नीचे ‘दो विभाग–एक खेल’ ! कहीं किराया वसूली, कहीं नोटिस की बरसात ! ताकतवरों पर मेहरबानी, गरीबों पर कार्रवाई ! अतिक्रमण हटाने के नाम पर फाइलों का फेहरिस्त ! बक्सर में सिस्टम नहीं, सियासी शतरंज बिछी!

साहब की नाक के नीचे ‘दो विभाग–एक खेल’ ! कहीं किराया वसूली, कहीं नोटिस की बरसात ! ताकतवरों पर मेहरबानी, गरीबों पर कार्रवाई ! अतिक्रमण हटाने के नाम पर फाइलों का फेहरिस्त ! बक्सर में सिस्टम नहीं, सियासी शतरंज बिछी!

बक्सर- शहर इन दिनों एक अनोखे तमाशे का गवाह है—तमाशा भी ऐसा कि दर्शक जनता है और कलाकार सिस्टम! सोन नहर की जमीन हो या नगर परिषद की दुकानें, हर जगह एक ही कहानी, बस किरदार बदल जाते हैं। साहब की नाक के नीचे खेल ऐसा चल रहा है कि न फुसफुसाहट सुनाई देती है, न फटकार की गूंज। नतीजा—जिसके पास रसूख है, वह बेफिक्र; और जो कमजोर है, वही नियमों का पहला शिकार।

बक्सर में कानून का पैमाना अलग-अलग !

कहा जाता है कि कानून सबके लिए बराबर होता है, लेकिन बक्सर में कानून का पैमाना अलग-अलग तराजू पर तौला जा रहा है। एक तरफ नगर परिषद के अधिकारी गरीब दुकानदारों को “दुकान नंबर” का सपना दिखाकर किराया वसूलते हैं, दूसरी तरफ नहर विभाग उन्हीं दुकानों पर नोटिस की चिट्ठी थमा देता है। यानी एक हाथ से सुरक्षा की रसीद, दूसरे हाथ से हटाने की चेतावनी !

वाह रे व्यवस्था!अतिक्रमण हटाने के नाम पर दौड़ रही है फाइल !

सोन नहर की जमीन पर पेवर ब्लॉक बिछाकर कब्जे का मामला अब किसी रहस्य से कम नहीं रहा। अतिक्रमण हटाने के नाम पर फाइलें दौड़ती रहीं, रिपोर्टें बनती रहीं, बल की मांग होती रही—लेकिन जमीन जस की तस। जिनकी जमीन पर कब्जा बताया जा रहा है, उन्हें आज तक यह नहीं बताया गया कि अतिक्रमण कितने वर्गफुट का है। कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी व्यायाम हुआ, जमीन पर पसीना नहीं गिरा।

नियम का तापमान !

विडंबना देखिए—इसी नहर से पत्थर कूटकर रोजी-रोटी चलाने वालों पर प्रशासन ठंड की रात में ऐसे टूट पड़ा, मानो वही सबसे बड़े अपराधी हों। नियमों की सख्ती कमजोरों पर बिजली बनकर गिरी, जबकि मजबूत दीवारों के आगे नियम मोम साबित हुए। सवाल उठता है क्या नियमों का तापमान भी है, जो ताकत देखकर ठंडा-गरम हो जाता है?

ज्योति चौक का कटरा इस खेल का सबसे चमकदार मोहरा बन चुका है।

ज्योति चौक का कटरा इस खेल का सबसे चमकदार मोहरा बन चुका है। हर साल नहर विभाग नोटिस भेजता है, दुकानदार सहमते हैं; कुछ दिन बाद नगर परिषद दुकान नंबर बांटकर छाती ठोक लेती है। दोनों विभागों की यह जुगलबंदी दुकानदारों के लिए दुधारी तलवार बन गई है—नोटिस का डर भी, किराए की रसीद भी। वोट की राजनीति में धरना-प्रदर्शन खूब होते हैं, लेकिन जिन दुकानदारों ने नियमों के मुताबिक भुगतान किया, उनकी पीड़ा पर चुप्पी छा जाती है।

दुकानदारो की गोलबन्दी !

अब तस्वीर बदलती दिख रही है। दुकानदारों की गोलबंदी शुरू हो चुकी है। उन्हें समझ आ गया है कि यह अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि “किसे बचाया जाए और किससे वसूला जाए” का खेल है। सवाल सिर्फ कब्जे का नहीं, चयनात्मक कार्रवाई का है—और यही सवाल सिस्टम के लिए सबसे असहज होता है।

न फुसफुसाहट, न फटकार।

शहर में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने और कराने का यह खेल बिना अंदरूनी सहभागिता के संभव नहीं। पर्दे के पीछे के खिलाड़ी कौन हैं, यह जनता अब समझने लगी है। साहब की खामोशी को लोग अजगर की नींद कह रहे हैं—न फुसफुसाहट, न फटकार। लेकिन इतिहास गवाह है, जब नींद टूटती है तो हलचल मचती है।

बक्सर में आज जरूरत किसी बड़े भाषण की नहीं, बल्कि एक साफ नियम और समान कार्रवाई की है। वरना यह व्यंग्य यूं ही चलता रहेगा—कहीं रसीद, कहीं नोटिस; कहीं संरक्षण, कहीं कार्रवाई। और जनता पूछती रहेगी—साहब, खेल कब खत्म होगा?

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