सोन नहर की जमीन पर कब्जा, सिस्टम नतमस्तक—झोपड़ी पर ही चलता कानून का बुल्डोजर ! पेवर ब्लॉक से लेकर आलीशान इमारत तक, अफसरों की नाक के नीचे ‘खुला खेल’ !

सोन नहर की जमीन पर कब्जा, सिस्टम नतमस्तक—झोपड़ी पर ही चलता कानून का बुल्डोजर ! पेवर ब्लॉक से लेकर आलीशान इमारत तक, अफसरों की नाक के नीचे ‘खुला खेल’ ! जलस्त्रोत का हवाला देकर उजाड़े गरीब, उसी नहर पर बना सरकारी दफ्तर! कागजों में जिंदा–मरी नहर का खेल, फाइलें बनी ढाल ! बक्सर में सवालों की बाढ़—कानून ताकतवरों के आगे क्यों सिमट जाता है?

,बक्सर- उत्तरायणी गंगा की पावन तट पर बसा बक्सर इन दिनों एक ऐसे विरोधाभास का गवाह है, जहाँ कानून का पैमाना समय, स्थान और ‘कद–ताकत’ देखकर बदलता दिखता है। आरोप है कि सोन नहर की कीमती सरकारी जमीन पर पेवर ब्लॉक बिछाकर, निर्माण कराकर और व्यवसायिक गतिविधियाँ चलाकर कब्जा किया गया, जबकि प्रशासनिक सख्ती का पूरा जोर गरीबों की झोपड़ियों पर ही दिखाई देता है।

अरबो की सरकारी जमीन पर कब्जा सिस्टम खामोश !

शहर के स्टेशन रोड, बाईपास नहर, सिंडिकेट गोलम्बर–जासो रोड, वनबीघा, चरित्रवन और गौशाला की  सरकारी संपत्ति पर कथित कब्जे की चर्चा सरेआम हो रही है। और सिस्टम खामोश है! स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन स्थानों पर दिनदहाड़े निर्माण और कारोबार होता रहा, पर नगर परिषद और सिंचाई विभाग की कार्रवाई चुनिंदा रही। नतीजा—“कानून के हाथ” सिर्फ कमजोरों तक ही लंबे दिखे।

गरीबो के लिए जिंदा नहर ताकतवरों के लिए बन जाता है मृत !

सबसे चौंकाने वाला सवाल जलस्त्रोत पर सरकारी भवन के निर्माण को लेकर उठ रहा है। दो साल पहले नगर थाना क्षेत्र के सिंडिकेट नहर के पास पत्थर कूटकर रोजी रोटी चलाने वाले दर्जनों परिवारों को “जलस्त्रोत” का हवाला देकर हटाया गया। जबकि  उसी जगह उसी समय परिवहन विभाग का भव्य भवन खड़ा हो गया। मामला तूल पकड़ने पर नहर को “मृत” बताकर फाइलें बंद कर दी गईं। जब नहर विभाग के कार्यपालक अभियंता से यह पूछा गया कि जलस्त्रोत पर सरकारी भवन की एनओसी किसने दी, तो जवाब आया—“फाइल में देखना पड़ेगा।” यह उत्तर ही प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

कौन करा रहा है नहर की जमीन पर गिट्टी बालू का कारोबार !

 ग्यारह नम्बर लख इटाढ़ी रेलवे गुमटी के पास सोन नहर की जमीन पर बालू–गिट्टी के कथित कारोबार की शिकायतें सामने आई हैं। स्थानीय दुकानदारों का दावा है कि यहाँ कारोबार के लिए विभागीय कर्मियों को मोटी रकम “चढ़ावा” के तौर पर दी जाती है; जो नहीं देता, उसे हटवा दिया जाता है। दुकानदार यह भी कहते हैं कि पिछले वर्ष एक कथित सीसीटीवी फुटेज पत्रकारों को दी गई थी, जिसके बाद उन्हें धमकियाँ मिलीं। हालांकि, इन आरोपों की निष्पक्ष जांच अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई।

किसने बनवाया सरकारी जमीन पर आलीशान हवेली !

स्टेशन रोड की अरबों की सरकारी जमीन पर बनी आलीशान इमारतें भी सवालों के घेरे में हैं। झोपड़ी में रहने वाले लोग तंज कसते हैं—क्या यहाँ कब्जा करने वाले ‘राजा हरिश्चंद्र’ हैं और गरीब ‘नास्तिक’? यदि नहीं, तो कार्रवाई का पैमाना अलग–अलग क्यों? क्या कारण है कि बड़े निर्माणों पर ताले नहीं लगते, पर झोपड़ियाँ रातोंरात उजड़ जाती हैं?

क्या कहते है जानकार !

विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी भूमि और जलस्त्रोत से जुड़े मामलों में नियम स्पष्ट हैं—अतिक्रमण, निर्माण और व्यवसायिक उपयोग के लिए सख्त प्रक्रिया और एनओसी अनिवार्य है। ऐसे में चयनात्मक कार्रवाई प्रशासन को कटघरे में खड़ा करती है। नागरिक समाज की मांग है कि सोन नहर और उससे जुड़ी सभी जमीनों का सीमांकन, एनओसी की सार्वजनिक सूची, तथा पिछले वर्षों की फाइलों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।


बक्सर के लोग अब जवाब चाहते हैं—कानून का तराजू कब समान होगा? कब फाइलों का खेल खत्म होगा? और कब सोन नहर की जमीन पर सचमुच कानून का राज दिखेगा?

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