सोन नहर की जमीन पर दिनदहाड़े कब्जा, अफसर मौन! गरीबों पर लाठी, दबंगों पर मेहरबानी—दोहरा सिस्टम उजागर!डीएम के आदेश हवा में, विभाग ‘कागज खोज’ खेल में व्यस्त! सीएम दौरे से पहले CBI जांच की उठने लगी मांग!

 बक्सर में कानून बेबस, भू-माफिया बेखौफ! सोन नहर की जमीन पर दिनदहाड़े कब्जा, अफसर मौन! गरीबों पर लाठी, दबंगों पर मेहरबानी—दोहरा सिस्टम उजागर!डीएम के आदेश हवा में, विभाग ‘कागज खोज’ खेल में व्यस्त! सीएम दौरे से पहले CBI जांच की उठने लगी मांग!

कानून अपना काम करेगा आखिर कब ?

बक्सर - बिहार का बक्सर जिला इन दिनों एक ऐसे कड़वे सच से रूबरू है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, कानून के राज और सरकारी दावों की परतें उधेड़ कर रख दी हैं। सोन नहर की सरकारी जमीन पर नया बस स्टैंड के समीप दिन के उजाले में पेवर ब्लॉक बिछाकर कब्जा—और वह भी बिना किसी भय के—इस बात का खुला प्रमाण है कि बक्सर में कानून सबके लिए एक-सा नहीं है। यहां ताकतवरों के लिए अलग नियम हैं और गरीबों के लिए अलग।

8 मिनट में उजाड़ दी थी झोपड़ी 8 दिन से ढूंढ रहे है दस्तावेज !


फाइल फोटो

हैरानी की बात यह है कि जिस सोन नहर की जमीन पर वर्षों से झोपड़ी डालकर जीवन गुजार रहे गरीब परिवारों को कड़ाके की ठंड में “जल स्त्रोत” का हवाला देकर लाठी के बल पर उजाड़ दिया गया, उसी जमीन पर आज रसूखदारों, दबंगों और भू-माफियाओं ने पक्के पेवर ब्लॉक बिछा दिए। न कोई नोटिस, न कोई कार्रवाई, न कोई एफआईआर—बस एक रहस्यमयी चुप्पी। यह चुप्पी अब प्रशासनिक कार्यालयों में सवाल बनकर केवल घूम रही  है।

सरकारी सरोवर से लेकर नहर तक, कब्रिस्तान, से लेकर चर्च तक की जमीन पर दबंगो ने कर ली कब्जा जिम्मेवार कौन ?

क्या इसे ही कहते है सता का हनक !

स्थानीय लोगों का आरोप है कि  सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों में किसी बड़े साहब का अर्दली, किसी मंत्री का रिश्तेदार, किसी पूर्व विधायक का करीबी ,पूर्व विधायक और सत्ताधारी दल से जुड़े चेहरे शामिल हैं। यही वजह है कि जो सच्चाई आम जनता को दिन के उजाले में दिख रही है, वह “दूरदृष्टि और नजदीकी दृष्टि दोष” से ग्रस्त अधिकारियों को नजर नहीं आ रही—या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है।

कार्यालय बनाम कार्यालय का खेल जारी!


अजित कुमार सिंह पूर्व विधायक

पूर्व विधायक अजित कुमार सिंह ने कहा कि,शिकायत दर्ज दर्ज हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन नहर विभाग और जिला प्रशासन अतिक्रमण हटाने के बजाय “कार्यालय बनाम कार्यालय” का खेल खेलने में व्यस्त है। कोई फाइल एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भेज रहा है, तो कोई कागज ढूंढने का बहाना बना रहा है। सवाल सीधा है—अगर आज कागज नहीं मिल रहे, तो आठ महीने पहले उसी जमीन से गरीबों को किस आधार पर खदेड़ दिया गया था? क्या तब कागज आसमान से टपक गए थे?

क्या कहते हैं अधिकारी?

जिला सूचना एवं जनसंपर्क पदाधिकारी का दावा है कि जिलाधिकारी इस मामले को लेकर सख्त हैं और अतिक्रमणकारियों पर एफआईआर दर्ज करने तथा जमीन को अतिक्रमण-मुक्त कराने का स्पष्ट निर्देश दे चुकी हैं। लेकिन डीएम साहिबा के आदेश के तीन दिन गुजर जाने के बाद भी न तो कोई बुलडोजर चला, न ही कोई प्राथमिकी दर्ज हुई। सोन नहर विभाग के अधिकारी फोन तक उठाने को तैयार नहीं हैं। यह स्थिति खुद जिलाधिकारी की प्रशासनिक पकड़ पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या बक्सर में विभागीय अधिकारी डीएम के आदेशों को भी ठेंगा दिखा रहे हैं?

तर्कों का महाजाल

जब जवाब मांगा गया तो दलील दी गई कि अधिकारी पटना में “कागज ढूंढ” रहे हैं। यह तर्क उतना ही खोखला प्रतीत होता है, जितना बालू की रेत में सुई ढूंढने का दावा। जनता पूछ रही है—क्या सच में कागज ढूंढे जा रहे हैं, या फिर कब्जाधारियों को बचाने का रास्ता तैयार किया जा रहा है?

पेवर ब्लॉक अतिक्रमण मामले की हो CBI जांच!

इस पूरे प्रकरण ने विपक्ष को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा दे दिया है। महागठबंधन के पूर्व विधायक अजीत कुमार सिंह ने जिला प्रशासन पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जिले के सबसे व्यस्त इलाके में सरकारी जमीन पर कब्जा हो जाए और प्रशासन यह कहे कि उसे पता नहीं किसने किया—यह सरासर जनता की बुद्धि का अपमान है। उन्होंने ऐलान किया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रस्तावित दौरे के दौरान लिखित रूप से इस मामले की CBI जांच की अनुशंसा करने की मांग की जाएगी, ताकि सच्चाई सामने आ सके और गरीब-कमजोर लोगों का प्रशासन पर भरोसा बना रहे।

असल सवाल यह नहीं है कि कब्जा किसने किया, बल्कि यह है कि क्या बक्सर में कानून का राज सिर्फ कमजोरों तक सीमित रह गया है? अगर आज पेवर ब्लॉक पर चुप्पी साध ली गई, तो कल पूरी सोन नहर ही नक्शे से गायब हो सकती है। प्रशासन के लिए यह वक्त अग्निपरीक्षा का है—या तो सख्त कार्रवाई कर भरोसा बहाल करे, या फिर इतिहास में उस सिस्टम के तौर पर दर्ज हो जाए, जो दबंगों के आगे घुटनों पर बैठ गया।

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