बक्सर में कौन चला रहा है शिक्षा विभाग में कमीशन का साम्राज्य? बड़े साहब की कुर्सी के नीचे कौन खेल रहा वसूली का खेल? सरकारी गोपनीय दस्तावेज का कौन लगा रहा है बोली !

 बक्सर में कौन चला रहा है शिक्षा विभाग में कमीशन का साम्राज्य? बड़े साहब की कुर्सी के नीचे कौन खेल रहा वसूली का खेल? सरकारी गोपनीय दस्तावेज आखिर शिक्षा माफियाओं तक कैसे पहुंच रहे? सदर विधायक के बयान से क्यों मची सियासी हलचल, राम की शिक्षा स्थली बक्सर में ज्ञानधाम बना ‘धनधाम’?

बक्सर - कहने को बिहार सरकार अपने बजट का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करती है, लेकिन सवाल यह है कि वह पैसा बच्चों की किताबों तक पहुंचता है या रास्ते में ही किसी “कमीशन के कुएं” में गिर जाता है? बक्सर का शिक्षा विभाग इन दिनों कुछ ऐसे ही सवालों के घेरे में है। आरोपों की बौछार इतनी तेज है कि अब चर्चा सिर्फ गलियारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सियासी मंचों से लेकर बड़े साहब के कार्यालय से लेकर चाय की दुकानों तक फैल चुकी है।

कौन लगा रहा है सरकारी दस्तावेजों की बोली ?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि बड़े साहब की कुर्सी के नीचे आखिर कौन सरकारी दस्तावेजों की बोली लगाकर कमीशन का खेल खेल रहा है? और साहब चुप्पी साधे हुए हैं! शिक्षा विभाग के सरकारी कर्मियों पर ही यह आरोप लग रहा है कि मोटी रकम लेकर वे ही सरकारी गोपनीय दस्तावेजों की बोली लगाकर शिक्षा माफियाओं को फायदा पहुंचा रहे हैं! जिसे सार्वजनिक करने का डर दिखाकर अधिकारियों से शिक्षा जगत के माफिया और तथाकथित जनप्रतिनिधियों के पीए अर्थात सहयोगी वसूली का खेल लाखों-करोड़ों में खेल रहे हैं!

जुमलेबाजी से नही हनक से चलता है शासन !

सदर विधायक आनन्द मिश्रा के बयान के बाद यह मामला और भी तूल पकड़ लिया है! विधायक जब अचानक शिक्षा विभाग के दफ्तर पहुंचे तो वहां दो कथित “शिक्षा माफियाओं” के नाम पर खुलकर चर्चा हुई। आरोप है कि विभाग के कुछ कर्मचारी ही गोपनीय सरकारी दस्तावेज उन्हें उपलब्ध करा देते हैं, ताकि वे सरकारी प्रक्रियाओं में पहले से तैयारी कर सकें और बाद में उसी का फायदा उठाकर मोटी कमाई कर सकें। सवाल यह है कि अगर सरकारी बाबू ही सरकारी व्यवस्था की बोली लगाने लगें, तो शिक्षा व्यवस्था का भविष्य किसके भरोसे रहेगा?

ज्ञान धाम बना धन धाम !



बक्सर की पहचान कभी ज्ञान और संस्कार की धरती के रूप में रही है। लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग तंज कसते हुए कहते हैं—“ज्ञानधाम कब धनधाम बन गया, किसी को पता ही नहीं चला।” शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप कोई नए नहीं हैं। स्कूलों में मिड-डे-मील से लेकर डेस्क-बेंच, खेल सामग्री, चाक-डस्टर, रंग-रोगन और यहां तक कि चहारदीवारी निर्माण तक में कमीशनखोरी की चर्चा आम है। कई बार बच्चों के भोजन में छिपकली, मेंढक या गंदगी मिलने की घटनाएं सामने आईं। मासूम छात्राओं से बर्तन साफ करवाने के वीडियो भी वायरल हुए। अधिकारियों ने जांच की घोषणा की, बयान दिए, लेकिन कार्रवाई अक्सर कागजों से आगे नहीं बढ़ी। लोगों का कहना है कि शिक्षा विभाग में “एरियल” के नाम पर हजारों की वसूली से लेकर वेतन भुगतान और खरीद-फरोख्त तक में कमीशन की परंपरा बन चुकी है।

चाय की दुकान पर चर्चा सरेआम !

जिला मुख्यालय के ज्योति चौक की चाय दुकान पर बैठे शहर के कुछ बुजुर्ग तंज कसते हुए कहते हैं—“अगर बक्सर में सबसे बड़ा उद्योग खोजिए तो वह शिक्षा विभाग ही निकलेगा, जहां ज्ञान से ज्यादा ‘लेन-देन’ का कारोबार चलता है।”

एक जनप्रतिनिधि के है दर्जनों प्रतिनिधि !


बिहार की राजनीति एवं सामाजिक अवधारणा के विषय पर शोध कर रहे छात्र नेता सह गरीब बच्चों में शिक्षा का अलख जगाने वाले समाजसेवी बिट्टू विश्वकर्मा ने बताया कि बिहार में कई बड़े निजी स्कूल-कॉलेज ऐसे लोगों के हैं जिनका सीधा संबंध राजनीति, नौकरशाही या शिक्षा माफियाओं से रहा है। ऐसे में सरकारी शिक्षा की हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है, जबकि निजी स्कूल लगातार फल-फूल रहे हैं। जब संसदीय कार्य मंत्रालय का हालिया पत्र साफ कहता है कि कोई भी जनप्रतिनिधि किसी विभाग में अपना प्रतिनिधि नियुक्त नहीं कर सकता, फिर सवाल उठता है कि एक-एक जनप्रतिनिधि के दर्जनों प्रतिनिधि विभागों में कैसे सक्रिय हैं? और अधिकारी उन पर कार्रवाई करने के बजाय उनकी खुशामद में क्यों लगे रहते हैं? आरोपों और सवालों के इस जाल में फिलहाल सच्चाई क्या है, यह जांच का विषय हो सकता है। लेकिन इतना तय है कि बक्सर के शिक्षा विभाग को लेकर उठ रहे सवाल अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सियासी और नैतिक बहस का मुद्दा बन चुके हैं।

अब देखने वाली बात यह है कि क्या सिस्टम खुद को साफ करेगा या फिर भ्रष्टाचार का यह ‘फेविकॉल वाला गठजोड़’ ऐसे ही चिपका रहेगा? क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ पैसों का नहीं है— यह सवाल उस पीढ़ी के भविष्य का है, जिसके हाथ में कल देश की कमान होगी।

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