“तीर का वार… कमल लाचार?” पास की राजनीति ने खोली गठबंधन की दरार ! मेहरबानी के नाम पर खेला गया मास्टरस्ट्रोक? बीजेपी में बगावत की चिंगारी या अंदरूनी विस्फोट? बक्सर बना सियासी ‘कुरुक्षेत्र’, पास बना ब्रह्मास्त्र!
बक्सर - जिले में इस बार सियासत ने ऐसा करवट लिया है कि विकास, योजनाएं और जनता सब पीछे छूट गए—और केंद्र में आ गया एक छोटा सा “पास”। लेकिन ये पास साधारण नहीं, सत्ता के खेल का वो पत्ता बन गया है जिसने गठबंधन की नींव तक हिला दी है। 25 मार्च को जैसे ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा का हेलीकॉप्टर बक्सर से उड़ा, वैसे ही जमीन पर सियासी बारूद फट पड़ा। आरोप सीधा है—जदयू विधायकों ने अपने पास बीजेपी नेताओं में बांट दिए। सुनने में मामूली, लेकिन इसके पीछे की सियासत बेहद खतरनाक मानी जा रही है।अपने ही नेताओ पर लगाया सौदेबाजी का आरोप !
बीजेपी के अंदर जो गुस्सा फूटा है, वो सिर्फ नाराजगी नहीं—बल्कि अंदरूनी बिखराव का संकेत है। कार्यकर्ताओं ने अपने ही नेताओं पर “सौदेबाजी”, “तुष्टिकरण” और “सियासी ठेकेदारी” जैसे शब्दों से हमला बोला। सोशल मीडिया रणभूमि बन गया, और “पास” को शकुनी का पासा बताकर सीधे विश्वासघात का आरोप लगाया गया। असल चोट वहां लगी, जहां सियासत सबसे ज्यादा संवेदनशील होती है—“सम्मान और पहुंच” पर। जो सालों से पार्टी का झंडा ढो रहे थे, वो गेट के बाहर रह गए… और जिनका नाम सूची में नहीं था, वो मंच पर नजर आए। यहीं से कहानी बदल गई—और सियासत ने जहर उगलना शुरू कर दिया।
जदयू जिलाध्यक्ष ने दी सफाई !
जदयू जिलाध्यक्ष राजकुमार शर्मा ने सफाई दी—कहा पास सीमित थे, नेताओं की सूची लंबी थी, इसलिए “गठबंधन धर्म” निभाया गया। लेकिन राजनीति में “धर्म” शब्द जितना पवित्र लगता है, उतना ही खतरनाक भी होता है—क्योंकि इसके पीछे अक्सर रणनीति छिपी होती है। बीजेपी के भीतर उठ रही आवाजें इसे सीधा “पावर शो” बता रही हैं। सवाल उठ रहा है—क्या जदयू ने जानबूझकर बीजेपी के अंदर असंतोष की आग भड़काई? क्या ये सिर्फ पास बांटना था, या फिर गठबंधन के भीतर ताकत का संकेत देना?कंधे की राजनीति या लॉलीपॉप !
इसी बीच एक तस्वीर ने आग को लपट बना दिया। मंच पर नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी और आनंद मिश्रा के कंधे पर एक साथ हाथ रखा। तस्वीर वायरल हुई और सियासी गलियारों में फुसफुसाहट शुरू—“संकेत किसके लिए है?” राजनीतिक विश्लेषकों का साफ कहना है—ये सब संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी चालें हैं। बिहार की राजनीति में अगर कोई “गेम चेंजर” है, तो वो नीतीश कुमार हैं। वो सीधे वार नहीं करते—बल्कि ऐसा जाल बुनते हैं, जिसमें विरोधी खुद फंस जाते हैं।पास बना पावर कांड !
पूरे घटनाक्रम को अगर गहराई से देखें तो ये “पास कांड” नहीं, बल्कि “पावर कांड” है। गठबंधन के भीतर कौन कितना मजबूत है, किसकी कितनी पकड़ है—यही असली लड़ाई है। बक्सर आज एक प्रयोगशाला बन गया है, जहां सियासत के नए फॉर्मूले टेस्ट हो रहे हैं। बीजेपी अंदर से उबल रही है, जदयू बाहर से मुस्कुरा रही है—और जनता ये सब तमाशा देख रही है।
बहरहाल अंत में सवाल वही—क्या ये सिर्फ एक इवेंट की अव्यवस्था थी, या फिर आने वाले बड़े राजनीतिक भूकंप की आहट? क्योंकि इस बार तीर सिर्फ चला नहीं है…सीधे निशाने पर लगा है— और कमल अब सिर्फ कन्फ्यूज नहीं… दबाव में नजर आ रहा है।




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