“लोक की थाली में नमक-रोटी, तंत्र की मेज़ पर सजी है शाही दावत ! जिस देश का किसान कर्ज में मरता है, उसी देश का नेता वातानुकूलित लोकतंत्र में जीता है! जनता धूप में जलती रही, सत्ता एसी में पलती रही ! खेत सूखते रहे, कागजों में सरकारी फव्वारे चलते रहे ! लोक का पसीना सूख गया, तंत्र का वैभव नहीं ! भारत — जहाँ वोट गरीब देता है और ऐश अमीर सत्ता करती है! बदलती सियासत और भूख से तड़पते किसानों को दिखाया जा रहा है “विश्वगुरु” का सपना! एसी कमरों में बैठे बड़का साहब किसानों के खेतों तक कागजों में पहुँचा चुके हैं सारी सुविधाएँ अजब लोकतंत्र की गजब तस्वीर !
बक्सर- यूँ तो भारत को दुनिया आज भी “कृषि प्रधान देश” कहती है। किताबों में अब भी लिखा जाता है- “भारत की आत्मा गाँवों में बसती है।” लेकिन शायद अब किताबें पुरानी हो चुकी हैं। क्योंकि आज आत्मा गाँवों में नहीं, बल्कि वातानुकूलित दफ्तरों, लालबत्ती वाली गाड़ियों और साहबों की शाही थालियों में बसती दिखाई देती है। हम ऐसा क्यों कह रहे है? दिन सोमवार, 18 मई। 2026 , बक्सर जिला अतिथि गृह में जैसे-जैसे शाम ढल रही थी, हलचल तेज होती जा रही थी। दैनिक मजदूरी करने वाले कर्मचारियों पर साहब गुस्से में चीख रहे थे— “अरे दो घंटे पहले बोला था एसी चालू कर कमरा ठंडा करो… मंत्री जी का काफिला भोजपुर से निकल चुका है… शाही दावत का इंतजाम पूरा होना चाहिए!” पूरा अतिथि गृह अफरा-तफरी में डूबा था। उसी कैंपस में पीपल के पुराने पेड़ के नीचे एक बुजुर्ग किसान घंटों से अपने जनप्रतिनिधि का इंतजार कर रहा था। शायद उस पर किसी की नजर नहीं थी। मैंने पास जाकर पूछा —“बाबा, कब से बैठे हैं?”उसने थकी आँखों से देखा और धीमी आवाज में बोला—“बेटा… विधायक जी से मिलने आया हूँ… लेकिन कोई बताने को तैयार नहीं है कि वो हैं कहाँ…”समय करीब शाम के छह बजे का था।विधायक ने कहा चौसा में हूँ !
उस किसान ने बताया कि वह एक छोटे से खेत पर खेती करता है। गाँव के दबंग उसकी जमीन कब्जाने की कोशिश कर रहे हैं। न्याय की उम्मीद लेकर वह अपने जनप्रतिनिधि के दरवाजे तक आया था। उसकी आवाज में भरोसा था… वही भरोसा, जो हर चुनाव में गरीब आदमी लोकतंत्र पर करता है। मैंने फोन मिलाया तो विधायक जी ने बताया कि वे चौसा प्रखंड में हैं। यह सुनते ही किसान की आँखों में उतर आई उम्मीद धीरे-धीरे बुझने लगी। वह उठकर जाने लगा। मैंने उसे एक पुलिस अधिकारी का नंबर देते हुए कहा—“बाबा, शिकायत दर्ज करा दीजिए… अगर सच होगा तो कार्रवाई जरूर होगी…” जरा सोचिए ! एक तरफ 45 डिग्री तापमान में बैठा किसान अपने नेता का इंतजार कर रहा था… दूसरी तरफ नेता जी के आने से पहले ही अतिथि गृह के कमरों को “चिल” किया जा रहा था। शायद लोकतंत्र की ऐसी खूबसूरत तस्वीर सिर्फ हमारे देश में ही देखने को मिलती है।रोहिणी नक्षत्र और किसान की उम्मीद
सुबह सूरज आग उगल रहा था। खेत की पगडंडी पर नंगे पैर चलते कुल्हड़िया गाँव के किसान लालबिहारी गोंड़ दिखाई पड़े। कंधे पर कुदाल, हाथ में चार सूखी रोटियाँ और एक छोटी डिब्बी में नमक-प्याज। यही उनका “लंच पैकेज” था। 45 डिग्री तापमान में वे खेत में कुदाल चला रहे थे। 25 मई को रोहिणी नक्षत्र में धान का बिचड़ा डालना है। लेकिन नहर में पानी कब आएगा, किसी को नहीं पता। बीज मिलेगा या नहीं, कोई बताने वाला नहीं। कृषि सलाहकार किसान के खेत से ज्यादा साहबों के दफ्तर में दिखाई देते हैं। उधर उसी समय शहर में लोकतंत्र की एक और “खूबसूरत तस्वीर” दिख रही थी। संगमरमर की चमचमाती फर्श पर चमड़े के जूते सरक रहे थे। एमएलसी साहब का काफिला भीड़ चीरता हुआ गेस्ट हाउस की ओर बढ़ रहा था।दस गाड़ियाँ आगे… पाँच पीछे… नाश्ते में फल, बादाम शेक और इटैलियन कॉफी पहले से तैयार थी। दोपहर के भोजन का मेन्यू भी तय था — “स्पेशल।” इधर लालबिहारी आसमान की तरफ देखते हैं। बादल कहीं नहीं हैं। बैंक का कर्ज सिर पर है। खाद महंगी, डीजल महंगा, बिजली गायब। लेकिन टीवी पर बहस चल रही है—“देश विश्वगुरु बन रहा है…”लालबिहारी समझ नहीं पाते कि यह “विश्वगुरु” आखिर रहता कहाँ है?क्योंकि उनके गाँव में तो स्कूल की छत टपकती है, अस्पताल में दवा नहीं मिलती और सड़कें बरसात में तालाब बन जाती हैं।सोफे पर मुस्कुराता लोकतंत्र
सत्ता के गलियारों में लोकतंत्र मुस्कुरा रहा है। कोई विधायक विश्राम कक्ष के सोफे पर पसरा है, कोई मसाज चेयर पर बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहा है। जनता की समस्याओं पर चर्चा कम और अगले चुनाव की रणनीति ज्यादा हो रही है। उधर एक नौकरशाह अपनी नई सरकारी गाड़ी का निरीक्षण कर रहा है।ड्राइवर एसी का तापमान ठीक कर रहा है। साहब फाइलों से ज्यादा अपने कमरे के इंटीरियर पर ध्यान दे रहे हैं। और इधर किसान की पत्नी घर में खाली बर्तन देखकर बच्चों को बहला रही है—“शाम तक तुम्हारे बाबूजी कुछ इंतजाम कर लेंगे…”लोक से दूर होता तंत्र
लोकतंत्र का सबसे खूबसूरत शब्द है — “जनप्रतिनिधि”।लेकिन अब यह शब्द सुनकर गाँव का आदमी मुस्कुराता नहीं… ठहाका मारता है। क्योंकि उसे पता है कि चुनाव के समय जो नेता उसकी टूटी चौखट पर बैठकर चाय पीता है, वही जीतने के बाद पाँच सितारा अतिथि गृह में जनता से मिलने का समय तय करता है।कभी-कभी लगता है कि इस देश में किसान सिर्फ पोस्टरों में बचा है…भाषणों में बचा है…घोषणाओं में बचा है… असल जिंदगी में वह सिर्फ आँकड़ा बनकर रह गया है—आत्महत्या का आँकड़ा…कर्ज का आँकड़ा…मुआवजे का आँकड़ा… लोकतंत्र की असली तस्वीर संसद भवन की चमक में नहीं, उस किसान की फटी एड़ियों में दिखती है जो भूखा रहकर भी देश का पेट भरता है।जो मिट्टी में पैदा करता है, वही मिट्टी के घर में तिल-तिल जीता है।और जो जनता के नाम पर राजनीति करता है, वह आलीशान बंगलों में लोकतंत्र का उत्सव मनाता है।शायद लोकतंत्र अब “लोक” से दूर होकर सिर्फ “तंत्र” बनता जा रहा है…जहाँ जनता सिर्फ वोट है…किसान सिर्फ नारा है…मजदूर सिर्फ भीड़ है… और सत्ता सिर्फ सुविधा। फिर भी हर चुनाव में लालबिहारी लाइन में खड़ा होकर वोट देता है। शायद उसे आज भी उम्मीद है कि कभी कोई नेता उसकी प्याज-नमक वाली थाली भी देखेगा… और लोकतंत्र सचमुच जनता तक पहुँचेगा।





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