बक्सर में किताबो में जिंदा है लोकतंत्र ! जमीन पर काम कर रहा है कुर्सी तंत्र ! गरीब को नही है स्कोर्पियों पर चढ़ने का सपना देखने को अधिकार ! क्या अप्राधियो को भी वर्दी पहना देती है हमारी सरकार !
बक्सर- बिहार के बक्सर में इन दिनों एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने लोकतंत्र, प्रशासन और इंसाफ — तीनों पर एक साथ बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ शराब मिलने का नहीं है। सवाल सिर्फ अवैध वसूली का भी नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस देश में सच बोलने की कीमत क्या है? क्या भ्रष्टाचार उजागर करने वाला हर आदमी अंत में अकेला छोड़ दिया जाएगा?
एक सप्ताह के अंदर बेनकाब हो गया सिस्ट्म !
पिछले एक सप्ताह के अंदर परिवहन विभाग के अंदर जो कुछ हुआ, उसने आम लोगों को भीतर तक झकझोर दिया है। 13 मई को परिवहन चेकपोस्ट से जुड़ा अवैध वसूली का ऑडियो और वीडियो वायरल हुआ। ऑडियो में ऐसी बातें सुनाई दीं जिसने यह एहसास करा दिया कि सरकारी तंत्र के अंदर कहीं न कहीं “कमाई का सिस्टम” जिंदा है। जनता में चर्चा शुरू हुई। लोग सवाल पूछने लगे। इस खेल का खुलासा करने वाला होमगार्ड जवान रातोरात हीरो बन गया ! लेकिन असली विस्फोट तब हुआ जब 14 मई को परिवहन कार्यालय से शराब मिलने की खबर सामने आई। बिहार जैसे राज्य में, जहां शराबबंदी कानून को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती है, वहीं सरकारी कार्यालय के भीतर शराब मिलने की खबर ने पूरे महकमे की साख पर कालिख पोत दी। लोगों को लगा कि अब बड़ी कार्रवाई होगी। जिम्मेदार चेहरे सामने आएंगे बेनकाब होंगे ! लेकिन हुआ ठीक उल्टा। कुछ ही समय में पूरा घटनाक्रम बदलने लगा। शराब “नॉन-अल्कोहलिक” बताई जाने लगी। पीने वाले “अज्ञात” हो गए। जिम्मेदार लोग “अनजान” हो गए। और देखते ही देखते पूरा सरकारी सिस्टम एक ऐसे कवच में बदल गया, जिसका मकसद सिर्फ कुर्सियों को बचाना था।कटघरे में होमगार्ड जवान !
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक चेहरा ऐसा था जिसे अचानक कटघरे में खड़ा कर दिया गया — होमगार्ड जवान जितेंद्र तिवारी। जिस जवान ने विभाग के भीतर की सड़ांध को उजागर किया, वही आज सवालों के घेरे में है। उससे पूछा जा रहा है कि उसने स्कॉर्पियो गाड़ी कैसे खरीदी? जैसे इस राज्य की सबसे बड़ी समस्या शराब, भ्रष्टाचार या अवैध वसूली नहीं, बल्कि एक गरीब जवान का गाड़ी खरीद लेना हो। लोग कहते हैं कि उसने अपनी जमीन बेचकर गाड़ी खरीदी। लेकिन सिस्टम गरीब की मेहनत पर भरोसा कहां करता है? यहां गरीब आदमी अगर आगे बढ़े तो शक पैदा होता है, और बड़े साहब अगर आलीशान जिंदगी जिएं तो उसे “पद की गरिमा” कहा जाता है।
साहब कहते है होमगार्ड जवान का है आपराधिक इतिहास !
अब जवान का आपराधिक इतिहास खोजा जा रहा है। लेकिन जनता पूछ रही है — अगर वह अपराधी था तो वर्षों तक वर्दी किसने पहनाई? सरकारी ड्यूटी किसने कराई? क्या सिस्टम खुद यह स्वीकार कर रहा है कि उसके भीतर अपराध पलता रहा? या फिर यह सब सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि बड़े लोगों पर उठ रहे सवालों का ध्यान भटकाया जा सके? आज सोशल मीडिया पर वही जवान लोगों के लिए हीरो बन गया है। लोग उसे उस आदमी की तरह देख रहे हैं जिसने डर के माहौल में निडर होकर सच बोलने की हिम्मत दिखाई। लेकिन सरकारी गलियारों में उसकी यही हिम्मत उसके लिए सजा बनती दिखाई दे रही है। उसे निम्बित कर दिया गया ! यह निलंबन उस जवान का नही है उस सिस्ट्म का है जंहा सच बोलना बगावत है! अब सरकारी दफ्तरों में ईमानदार कर्मचारी डरने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि भ्रष्टाचार करना उतना खतरनाक नहीं, जितना भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना है। क्योंकि यहां गुनाह करने वालों को नहीं, गुनाह उजागर करने वालों को कुचला जाता है।
बक्सर की यह घटना सिर्फ एक विभाग की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जहां छोटे कर्मचारी आसानी से बलि का बकरा बना दिए जाते हैं, ताकि बड़े साहबों की कुर्सियां सुरक्षित रह सकें। लोकतंत्र की आत्मा तब रोती है, जब सच बोलने वाला इंसान अकेला पड़ जाता है और पूरा सिस्टम उसकी आवाज दबाने में लग जाता है। आज सवाल सिर्फ एक जवान का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जो जनता लोकतंत्र पर करती है। अगर सच बोलने वाले ही गुनहगार बना दिए जाएंगे, तो आने वाले समय में कोई भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करेगा। और जिस दिन समाज डर के कारण चुप हो जाएगा, उस दिन लोकतंत्र सिर्फ किताबों में बचा रहेगा।




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