शराब, रिश्वत और वायरल वीडियो के बीच सवालों में बक्सर का सिस्टम ! मुख्यमंत्री के आगमन से पहले फिर वायरल हुआ ‘रेट फिक्सिंग’ का वीडियो ! जांच कमेटी बनी, रिपोर्ट गायब… कार्रवाई शून्य, साहब मजबूत!जनता पूछ रही — कानून छोटों के लिए और संरक्षण बड़ों के लिए क्यों?
बक्सर - बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बक्सर आगमन से कुछ घंटे पहले जिला परिवहन विभाग का एक और कथित वसूली वीडियो सामने आने के बाद पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर सवालों की बौछार शुरू हो गई है। ऐसा लग रहा है जैसे बक्सर का परिवहन कार्यालय अब सरकारी दफ्तर कम और “वसूली लिमिटेड कंपनी” ज्यादा बन चुका है, जहाँ नियम किताबों में और खेल कैमरे के पीछे चलता है। वायरल वीडियो में वर्दी और बेल्ट पहने एक व्यक्ति पूछता दिखाई दे रहा है — “पैसा किसको दिया?” जवाब आता है — “आरटीओ को एक हजार।” इसके बाद सवाल होता है — “ऐसा ही बेल्ट पहने था?” और जवाब में सामने वाला “हाँ” कह देता है। अब यह वीडियो असली है या नहीं, इसकी पुष्टि जांच का विषय हो सकता है, लेकिन जनता पूछ रही है कि आखिर हर बार धुआँ परिवहन विभाग से ही क्यों उठता है?
वसूली का एक और वीडियो वायरल !
बताया जा रहा है कि 11 मई को बालू लदे वाहन से कथित वसूली का मामला सामने आया था। फिर 13 मई को कोयला लदे ट्रक को कथित तौर पर 15 हजार रुपये लेकर छोड़ देने की चर्चा ने बाजार गर्म कर दिया। ऑडियो वायरल होने के करीब 10 घंटे बाद 40 हजार का जुर्माना काटा गया, मानो कानून पहले सोशल मीडिया की अनुमति लेता हो और फिर जागता हो।
अज्ञात लोगों ने रख दिया ज्ञात कार्यालय में शराब !
मामला यहीं नहीं रुका। 14 मई को परिवहन कार्यालय परिसर से शराब की दर्जनों भरी और खाली बोतलें बरामद हुईं। बिहार जैसे शराबबंदी वाले राज्य में सरकारी कार्यालय से शराब मिलना अपने आप में ऐसा तमाचा है, जिसकी गूंज पटना तक सुनाई देनी चाहिए थी। लेकिन नौ दिन बीत गए, कार्रवाई अब तक “अज्ञात” की फाइल में बंद पड़ी है। जनता तंज कस रही है कि शायद शराब भी खुद चलकर कार्यालय में घुस गई होगी और बोतलें खुद ही अलमारी में सज गई होंगी। हैरानी की बात यह है कि जब किसी जनप्रतिनिधि की गाड़ी में शराब मिलती है तो नामजद एफआईआर और जब्ती तुरंत हो जाती है, लेकिन परिवहन विभाग में शराब मिलने पर मामला “अज्ञात” के हवाले कर दिया जाता है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या बक्सर में कानून की आंखों पर भी विभागीय पट्टी बांध दी गई है?
जांच रिपोर्ट या लीपापोती !
जांच के नाम पर तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई, 24 घंटे में रिपोर्ट देने की बात हुई, लेकिन रिपोर्ट कहाँ गई, किस टेबल पर सो गई या किस फाइल में दफन हो गई — यह अब तक रहस्य बना हुआ है। जनता कह रही है कि यहाँ जांच कम और “लीपापोती कला” ज्यादा चल रही है।यंहा छोटे कर्मचारी पर कार्रवाई बिजली की रफ्तार से होती है, लेकिन बड़े साहबों तक पहुंचते-पहुंचते सिस्टम का पेट्रोल खत्म हो जाता है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि बक्सर का परिवहन विभाग शायद लोकतंत्र से नहीं, “रसूखतंत्र” से चलता है। यहाँ कुर्सी इतनी मजबूत है कि वायरल वीडियो, शराब बरामदगी और रिश्वत के आरोप भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे।
अब मुख्यमंत्री के आगमन से पहले यह मामला सरकार की साख पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। जनता पूछ रही है कि आखिर किसकी छतरी के नीचे यह पूरा खेल चल रहा है? क्या बड़े अधिकारियों की मौन सहमति से सबकुछ हो रहा है या फिर रसूखदारों की नजदीकी कार्रवाई की राह रोक रही है? बक्सर की गलियों में अब एक ही चर्चा है — “अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में सरकारी बोर्ड बदलकर शायद लिखना पड़े —‘जिला परिवहन कार्यालय : सुविधा शुल्क देकर सेवा लें।’”





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